लाहौल-स्पीति (हिमाचल प्रदेश): भारतीय रसोई की अनिवार्य और सबसे सुगंधित सामग्री हींग (असाफेटिडा) अब भारत में भी उगाई जा रही है। सालों से जो चीज केवल अफगानिस्तान और ईरान जैसे देशों से आयात होती थी, अब वह आत्मनिर्भर भारत का हिस्सा बन रही है। यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले के छोटे से गांव सल्ग्रां ने, जहाँ देश में पहली बार हींग की सफल खेती की गई है।
सल्ग्रां गांव के किसान की मेहनत लाई रंग
सल्ग्रां गांव के किसान तोग़ चंद ठाकुर ने यह करिश्मा कर दिखाया है। उनकी मेहनत और साहस को CSIR–हिमालय जैवसंपदा संस्थान, पालमपुर की वैज्ञानिक विशेषज्ञता का साथ मिला। संस्थान के वैज्ञानिकों ने भारतीय मौसम और मिट्टी के अनुकूल हींग की खास किस्म विकसित की, जिसे हिमाचल की ठंडी और ऊँचाई वाली जलवायु में उगाया जा सकता है।
भारत का हींग आयात 1,000 करोड़ रुपये
संस्थान के निदेशक डॉ. सुदेश कुमार यादव और उनकी टीम ने इस पूरे प्रयास को नज़दीक से देखा और उसका मार्गदर्शन किया। वैज्ञानिकों के अनुसार, भारत का सालाना हींग आयात 800 से 1,000 करोड़ रुपये तक होता है। ऐसे में अगर देश में हींग की व्यावसायिक खेती सफल होती है, तो यह न सिर्फ विदेशी निर्भरता को खत्म करेगा, बल्कि किसानों के लिए एक नया लाभकारी विकल्प भी बन सकता है।
हींग की खेती नवाचार का उदाहरण
हींग का पौधा बहुत संवेदनशील होता है और इसकी खेती के लिए विशिष्ट परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। लेकिन सल्ग्रां की मिट्टी और मौसम ने इसे पूरी तरह अनुकूल साबित किया। यह न केवल भारतीय कृषि में नवाचार का उदाहरण है, बल्कि यह बताता है कि यदि सही तकनीक और वैज्ञानिक सहयोग मिले, तो भारत के किसान किसी भी असंभव को संभव बना सकते हैं।
आत्म निर्भर भारत की दिशा में कदम
यह पहल ‘वोकल फॉर लोकल’ और आत्मनिर्भर भारत अभियान की दिशा में एक मील का पत्थर है। आने वाले समय में देश के अन्य पहाड़ी राज्यों में भी हींग की खेती को बढ़ावा देने की योजना है। अब हिमाचल की वादियों से निकली हींग की खुशबू न केवल थालियों में महकेगी, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता की पहचान भी बनेगी।