Kisan Protest Live: न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और स्वामीनाथन की सिफारिशें समेत अन्य मांगों को लेकर कई राजियों के किसानों ने एक बार फिर से दिल्ली कूच करना शुरू कर दिया है। राजधानी दिल्ली की सभी सीमाओं को सील कर दिया। 150 से ज्यादा किसान संगठन अपनी मांगों को लेकर दिल्ली की सीमाओं पर जुटने शुरू हो गए।
इस बार आंदोलन की जो प्रमुख मांग है वो है न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी (एमएसपी)। किसान मांग कर रहे हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी दी जाए और सभी फसलों को एमएसपी के दायरे में लाया जाए। ऐसे में यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि एमएसपी आखिर होता क्या है?
क्या है एमएसपी?
एमएसपी यानी कि मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) या यूं कहें न्यूनतम समर्थन मूल्य। एमएसपी वो दर होती है जिस पर सरकार किसानों से फसल खरीदती है। ये किसानों की उत्पादन लागत से कम से कम डेढ़ गुना अधिक होती है। केंद्र सरकार फसलों की एक न्यूनतम कीमत तय करती है। किसान को अपनी फसल की एमएसपी के तहत निर्धारित कीमत मिलती ही मिलती है, चाहे बाजार में दाम जो हो। लेकिन केंद्र सरकार हर फसल पर एमएसपी नहीं देती है।
23 फसलों की होती हैं एमएसपी पर खरीद
बता दें कि, फिलहाल कुल 23 फसलों पर एमएसपी या न्यूनतम समर्थन मूल्य देती है। इन फसलों को ‘अधिदिष्ट फसल’ की कैटेगरी में रखा गया है। जिनमें 14 खरीफ फसलें, 6 रबी फसलें और दो अन्य वाणिज्यिक फसलें आती हैं। इन फसलों में धान, गेहूं, बाजरा, मक्का, ज्वार, रागी, जौ, चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर, सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी, तिल, नाइजर या काला तिल, कुसुम, गन्ना, कपास, जूट, नारियल शामिल हैं।
इन फसलों के अलावा गन्ने के लिये ‘उचित और लाभकारी मूल्य’ की सिफारिश की जाती है। साल 1966-67 में केंद्र सरकार ने पहली बार एमएसपी पेश किया था। ऐसा उस दौरान हुआ जब जब स्वतंत्रता के समय भारत को अनाज उत्पादन में बड़े घाटे का सामना करना पड़ा था। तब से लगातार एमएसपी की व्यवस्था चल रही है। किसान सभी फसलों को एमएसपी के दायरे में लाने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की मांग कर रहे हैं।
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