बाढ़ में झुग्गियों में रहने वालों लोगों के सामने पहाड़ जैसी

उत्तर भारत के कई इलाकों में भारी बारिश के चलते लोग बाढ़ की समस्या से जूझ रहे हैं। यमुना नदी में जल स्तर खतरे के निशान को पार कर चुका है। गुरुवार तक की बात करें तोयमुना नदी में जल स्तर अब तक के सबसे ऊंचे स्तर- 208 मीटर से अधिक पर पहुंच गया था।

स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा

पिछले एक हफ्ते से लगातार हो रही बारिश ने देश में संकट जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। दिल्ली के कई इलाके जैसे-कश्मीरी गेट, आईटीओ और राजघाट अभी भी जल-जमाव से जूझ रहे हैं। इन इलाकों के आस-पास रहने वाले आम लोगों को भयंकर त्रासदी से जूझना पड़ रहा है। मौके पर राहत और बचाव के लिए एनडीआरफ की टीम मौजूद है।हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि बाढ़ के समय और पानी का स्तर नीचे जाने पर स्वास्थ्य संबंधी बड़ी समस्याएं हो सकती हैं।

झुग्गियों, बस्तियों में रहने वाले लोगो के हालात


देश के किसी भी हिस्से में जब भी बाढ़ जैसे हालात पैदा होते हैं तो सबसे ज्यादा समस्या आम लोगो को होती है। वो भी सबसे ज्यादा उन लोगो को जो गरीबी रेखा से निचले स्तर पर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। वो लोग जो बस्तियों में झुग्गियों में अपना जीवन जीने को मजबूर हैं। यह लोग बड़ी मुश्किल से अपने लिए रहने और खाने का प्रबंध कर पाते हैं जो कभी भी बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। अक्सर देखा और सुना जाता है कि बाढ़ की वजह से इन लोगों की झुग्गियां डूब जाती हैं। जिसमें कई लोग अपनी जान गंवा देते हैं तो कई लोग जिंदा भी रह जाते हैं तो अपने जरूरी कागजात खो देते हैं।

झुग्गियों में रहने वाले लोग बड़ी मुश्किल से अपनी पहचान साबित करने के लिए आधारा कार्ड, वोटर कार्ड और राशन कार्ड जैसे पहचान पत्र बना पाते हैं। लेकिन ज्यादा बारिश की वजह से जब बाढ़ जैसे हालात उत्पन्न होते हैं तो उनके यह जरूरी कागजात भी पानी के बहाव में बहकर उनसे कोसो दूर निकल जाते हैं। ऐसे में उन्हें फिर से यह सारे कागजात बनवाने के लिए भारी मुश्किल का सामना करना पड़ता है।

अनेक जानलेवा बीमारियों का खतरा

झुग्गियों में रहने वाले लोगों के बच्चों को भी बाढ़ के समय अनेक बीमारियों से जूझना पड़ता है। सबसे ज्यादा खतरा 3 से 15 साल के बच्चों को होता है। रिपोर्ट के अनुसार यमुना नदी के बाढ़ का पानी सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और अन्य हानिकारक पदार्थों सहित विभिन्न प्रदूषकों से दूषित होने का खतरा बना हुआ है। इस प्रदूषण से हैजा, टाइफाइड, हेपेटाइटिस ए और गैस्ट्रोएंटेराइटिस जैसी गंदे पानी से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

बाढ़ के समय खासकर वायरल और संक्रमण का प्रभाव ज्यादा होता है। साथ ही इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार जैसी खतरनाक बीमारी भी तेजी से अपने पैर पसारती है। इंसेफेलाइटिस के कहर का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 4 दशक में इस बीमारी से 20 हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं। ऐसे में बाढ़ के समय झुग्गियों में रहने वाले लोगों के लिए स्वास्थ्य संबधी सुविधाएं मुहैया कराने की बेहद जरूरत है। ताकि इनके जीवन को भी बचाया जा सके।

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