संतोष कुमार सिंह
नई दिल्ली: बोर्डर पर तनाव है। ऐसा लगता है कि देश में चुनाव है। अजी देश में तो चुनाव चलता रहा है। कभी पंचायत चुनाव, कभी विधानसभा चुनाव तो कभी आम चुनाव। लेकिन इस बार बोर्डर पर तनाव नहीं है बल्कि एक राज्य ही जल रहा है और राष्ट्रवादी बुखार में तप रहा देश इन दिनों इजराईल और फिलिस्तिन के विवाद से परेशान दिखाई देता है और देश के कई राज्यों में चुनाव की घोषणा हो गई है। कोई इसे लोकसभा चुनाव का सेमीफाईनल बता रहा है तो कोई यह कहकर खुद को तसल्ली देता हुआ दिखाई देता है कि अभी लोकसभा चुनाव में देरी है और लोकसभा के मुद्दे अलग होते हैं और विधानसभा के मुद्दे अलग।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना व मिजोरम के विधानसभा चुनावों में जीत को लेकर सियासी दल अपनी पूरी ताकत लगाये हुए हैं। जीत का सेहरा किसके सर बंधेगा ये तो वहां के स्थानीय मतदाताओं को तय करना है लेकिन अब अमूमन सभी चुनावों में मुद्दे एक से ही होने लगे हैं। यानी ये नया दौर है। चुनाव चाहे राज्यों का हों या लोकसभा का विमर्श की परिपाटी कमोबेश एक सी होने लगी है। क्योंकि इन चुनावों देश के प्रधानमंत्री से लेकर पार्टी के अध्यक्ष तक वोट मांगते नजर आते हैं। और कोई भी किसी भी चुनाव में उम्मीदवार हो सकता है।
आगामी राज्यों के चुनाव को ही देखिये। कई केंद्रीय मंत्री और सांसद विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी बना दिये गये लगते हैं।हालांकि इन बातों को विपक्षी दल कांग्रेस ज्यादा उठा रही है लेकिन भाजपा के जिन केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को आगामी विधानसभा चुनावों में प्रत्याशी बनाया गया है वो इसे पार्टी का निर्णय मान बिना किसी ना नुकूर के स्वीकार करते हुए नजर आते हैं। पूछे जाने पर कहते हैं कि केन्द्रीय मंत्रियों व सांसदों को विधानसभा चुनाव लड़ाने को लेकर पूछे गये सवालों के जवाब में कई भाजपा नेता कहते हैं कि ये सारे सवाल बेतुके हैं क्योंकि उनकी पार्टी ने बंगाल व कर्नाटक के चुनावों में भी केन्द्रीय मंत्रियों व सांसदों को लड़ाया था तब तो सवाल नहीं उठे थे।
हालांकि कांग्रेस का अपना तर्क है कांग्रेस कहती है कि केन्द्रीय मंत्रियों व सांसदों को भाजपा इसलिए लड़ा रही है क्योंकि उसके पास मतदाताओं के सामने जाने भर को विश्वासपात्र चेहरे ही नहीं रह गये हैं।
यानी सबके अपने अपने दावे हैं और सबके अपने अपने चाणक्य। वैसे भी कमोबेश हरेक दल की यही स्थिती होती जा रही है कि हमेशा जीत का सेहरा किसी खास के सर पर बांधा जाता है और हार की जिम्मेवारी सामूहिक होती है। इन चुनावों में भी यदि केंद्रीय मंत्री, सांसद को लड़ाने वाला फार्मूला कामयाब रहता है तो हमेशा की तरह जीत का सेहरा नरेंद्र मोदी के उपर बंधना है और यदि ये हार गये या पार्टी हार गई तो हार का ठेकरा इन्हीं के पास होगा।
जाहिर है बाकी दलों से लड़ाई तो बाद में होगी लकिन पहले अपनी पार्टी के ही चंद लोगों को निपटाने के लिए ये चुनाव याद किया जायेगा। यानी अपनी पार्टी के सम्बन्धित राज्यों के ‘खिलाड़ियों’ को ‘दरकिनार’ और केन्द्रीय मंत्रियों व सांसदों को ‘आगे’ करके जो व्यूह रचना की गई है उसको देखते हुए इसे सेमिफाईनल कहें या फाईनल लेकिन निशाने पर अपने ही हैं। जीत किसकी होगी ये तो जनता तय करेगी लेकिन हार का ठीकरा किसके माथे फोड़ा जायेगा इसका इंतजाम पहले ही कर लिया गया है।