संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: लोकनायक और भारतीय पत्रकारिता विषय पर इंदिरा गांधी नेशनल ओपेन यूनिवर्सिटी (इग्नू) द्वारा दिल्ली में आयोजित परिचर्चा में जाने-माने लेखक,साहित्यकार,शिक्षक औरंगाबाद निवासी राकेश कुमार ने बतौर मुख्य वक्ता भाग लिया। इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण ज्ञान दर्शन चैनल पर हो रहा था। लोकराज के लोकनायक पुस्तक के लेखक व जेपी के जीवन पर व्यापक शोध करने वाले राकेश कुमार ने कहा कि बिहार के सारण के सिताब दियरा में वर्ष 1902 में जन्में महान जन नेता व समाजवाद के जनक थे. जेपी को स्वदेश से बेहद प्रेम था। इसलिए अमेरिका में पढ़ाई के दौरान उनके मन में भारत को आजाद देखने की लौ जल रही थी। यही वजह रही कि वे भारत लौट गये और स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय हो गये। वह आचार्य विनोबा भावे से प्रभावित हुए और सर्वोदय आंदोलन से जुड़े। भारत छोड़ो आंदोलन में जेपी की अहम भूमिका थी। नेपाल से आजाद दस्ता व रेडियो का प्रसारण कर उन्होंने अंग्रेजों की कमर तोड़ दी थी। लोकनायक के बेमिसाल राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा पहलू यह है कि उन्हें कभी भी सत्ता का मोह नहीं था। यही कारण है कि नेहरू की कोशिश के बावजूद वह मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुए। वह सत्ता में पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करता चाहते थे।
जेपी ने कहा था कि भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना,शिक्षा में क्रांति लाना ऐसी चीजे है जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकती,क्योंकि वे इस व्यवस्था के ही उपज थे। वे तभी पूरी हो सकती है जब संपूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और संपूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए संपूर्ण क्रांति की आवश्यकता है। जेपी दूरदर्शी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले जन नेता थे। जल संरक्षण,पौधारोपण जो हमारे बीच चर्चा में है उस पर जेपी 70 साल पहले काम कर रहे थे। वे गरीबों के दुख से दुखित रहते थे और सत्ता के बदले व्यवस्था परिवर्तन पर जोर देते थे। नवादा के कौआकोल स्थित शोखो देवरा आश्रम जेपी के अविस्मरणी स्मृति का संग्रह है। यहां से स्वराज, स्वदेशी,भ्रष्टाचार मुक्त और लोकतंत्र की कल्पना करने वाले विचारों की खुशबू मिलती है। यहां के लोग आज भी जेपी को अपना नायक मानते है। हमे जेपी के आदर्शों और उनके मूल्यों को जीवन में उतारना चाहिए। कार्यक्रम में इग्नू के पत्रकारिता विभाग के डॉ अमित कुमार ने भी अपना विचार रखा। कार्यक्रम का संचालन आदित्य ओझा ने किया।