गुजरात से लौटकर संतोष कुमार सिंह
दिल्ली: गुजरात एक बार फिर से चुनाव के मुहाने पर खड़ा है। ऐसे में गुजरात के विकास और गुजरात मॉडल की चर्चा फिर से जोड़ों पर है। कहीं गुजरात मॉडल को लेकर निशाना साधा जा रहा है तो कहीं गुजरात मॉडल से अन्य राज्यों को सीखने की बात हो रही है। ऐसा पहली बार नहीं है कि गुजरात मॉडल चर्चा का विषय बना हो। वर्ष 2012 में जब गुजरात के तत्कालिन मुख्यमंत्री और देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया तो गुजरात मॉडल की चर्चा पूरे देश में जोर शोर से शुरू हुई और नरेंद्र मोदी के चुनावी सफलता को उनके मुख्यमंत्रित्व काल में किये गये सामाजिक विकास के तराजू पर रख कर तौला गया और वह क्रम आज तक जारी है जब उन्हें देश के प्रधानमंत्री बने 8 साल से ज्यादा हो चुके हैं।
विगत दिनों गुजरात के कुछ आदीवासी बहुल जिलों की यात्रा का मौका मिला और जेहन में जो सवाल आये वो उसी गुजरात मॉडल को लेकर ही थे। वैसे तो यात्रा का मुख्य मकसद सामाजिक विकास और मानव विकास के कुछ सूचकांको पर गुजरात में हो रहे कामकाज की पड़ताल करनी थी जो कि बहुचर्चित गुजरात मॉडल का मात्र एक पहलू है जिसका अनुकरण हरेक राज्य को करना चाहिए।
इसके लिए चुना नर्मदा के एक महत्वाकांक्षी जिले का – जो सरकारी आंकड़ों में पिछड़ा और आदिवासी जिला है। लेकिन जब आप इस जिले के आदीवासी जिले के गांवों को घूमते हैं तो कदमकदम पर दिखती है गुजरात मॉडल की छाप। देश की पांचवीं सबसे बड़ी नदी नर्मदा के तट पर बसे आदिवासी बहुल जिले की लंबाई और चौड़ाई से गुजरते हुए सहसा ही इसका आभाष होने लगता है।
आदिवासियों द्वारा बसे ग्रामीण परिवेश में एक विशिष्ट भारतीय गांव जैसा दिखने वाला गांव मिलना मुश्किल है। गांव के अंदर पक्की सड़कें, हर घर तक उपलब्ध पीने का स्वच्छ जल, परंपरागत शैली में बने साफ सुथरा और स्वच्छ मकान और साथ ही विकास के अन्य सभी दृश्यमान संकेत।
वास्तव में, मातृ पोषण, जन्म परिणामों और बच्चे की पोषण की स्थिति में सुधार के लिए गुजरात सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग और यूनिसेफ के आपसी सामंजस्य से चलाये जा रहे कार्यक्रमों के माध्यम से आदिवासी लाभार्थियों, महिलाओं और बच्चों की प्रगति और विकास के मानकों फलते फूलते दिखाई देते है।
अपनी यात्रा के दौरान जब गुजरात के अपेक्षाकृत दूरस्थ और दुर्गम गांव की ओर जाते हैं तो हमें पता चलता है कि वास्तव में गुजरात मॉडल की चर्चा क्यों होती है। चाहे डेडियापाड़ा ब्लॉक में गजरगोटा, निवाल्दा और कानबुडी गांव और नन्दोद और गरुड़ेश्वर ब्लॉक के प्रतापपुरा और नवा वाघपुरा। इन सारे जगहों पर आंगनवाड़ी केंद्रों की जो स्थिती दिखाई देती है और जिस तरह का माहौल दिखाई देता है तो अक्सर आपको गुजरात मॉडल की झलक मिलने लगती है। इस पूरे इलाके के आंगनवाड़ी केंद्रों में महिला एवं बाल विकास विभाग व यूनिसेफ के आपसी सामंजस्य से इन केंद्रों में बच्चों, उनकी माताओं और गर्भवती महिलाओं और किशोरियों की मदद करने के लिए पोषण कार्यक्रमों को सुचारू रूप से चलाने के लिए बहुआयामी स्तर पर प्रयास होते दिखाई देते हैं।
इस योजना की लाभार्थी सरकारी प्रयासों व यूनिसेफ के द्वारा दिये जा रहे सहयोग से संतुष्ट नजर आते हैं। बातचीत के क्रम में 15 वर्षीय प्रीति डी वसावा कहती हैं कि आंगनवाड़ी केंद्र से जुड़ने के बाद उनको काफी लाभ हुआ है। वे बताती है आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के द्वारा उन्हें पूर्णा योजना की जानकारी मिली जिसके अंर्तगत गर्भवती महिलाओं, धात्री महिलाओं को पूर्ण और पोषक आहार दिया जाता है। बसावा बताती हैं कि आंगनवाड़ी केंद्र से जुड़ने के मात्र तीन माह के अंदर ही उन्हें बदलाव महसूस होने लगा था। चाहे पोषण की स्थिति हो या हीमोग्लोबिन का स्तर सबमें उल्लेखनीय सुधार हुआ। प्रीति कहती हैं जून के महीनें में जब उन्होंने पंजीकरण कराया था तो कम वजन और एनीमिया की शिकायत मिली लेकिन इस योजना से जुड़ने के मात्र 3 माह में ही उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ। इसी तरह पोषण सुधा योजना जो 0 वर्ष से 18 वर्ष के बीच के बच्चों के लिए चलाई जा रही है इसके जरिए गर्भवती महिलाओं और उनके नन्हे-मुन्नों बच्चे कुपोषण के कारण जिस तरह की चिकित्सा संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे थे, उन सबसे निजात मिला और वे आज स्वस्थ हैं। ये अनुभव सिर्फ प्रीति डी बसावा के ही नहीं है बल्कि आंगनवाड़ी केंद्र से जुड़े सभी महिलाओं व बच्चों के हैं जिनके जीवन में बदलाव आया है स्वास्थ्य में सुधार हुआ है।
पोषण सुधा योजना (एक पूर्ण भोजन योजना), दूध संजीवनी योजना, प्रारंभिक बचपन विकास परियोजना, गंभीर तीव्र कुपोषण कार्यक्रम का एकीकृत प्रबंधन (एसएएम), मुख्यमंत्री मातृशक्ति योजना, पूर्ण भारत सरकार के सहयोग से शुरू किया गया है और गुजरात, यूनिसेफ और अन्य गैर सरकारी संगठनों ने सुचारू रूप से जमीन पर उतार कर इनके जरिए आम आदिवासी महिलाओं व बच्चों के जीवन में जो वास्तविक बदलाव लाया है और जिस तरह का बदलाव वे महसूस कर रहे हैं, वह निश्चित रूप से संतोष जनक है। बड़ी बात ये है पोषण से जुड़ी योजनाओं को मनरेगा से भी जोड़ा गया है, जिसके जरिए इन योजनाओं को काफी मदद मिली है।
पोषण सुधा जैसी पहलों का कुशलता पूर्वक संचालन जिसमें युवा माताओं और गर्भवती महिलाओं के अलावा एक पूर्ण, संतुलित, पौष्टिक भोजन दिया जाता है। एक माह तक मुफ्त राशन यहां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आवश्यक पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं को एकीकृत करती हैं – जहां गर्भवती महिलाओं और युवा माताओं को सलाह दी जाती है कि घर पर पौष्टिक भोजन कैसे बनाया जाए।
बड़ी बात ये है कि स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी सभी योजनाओं में आंगनवाड़ी केंद्र की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है और पंचायत उसमें अहम भूमिका निभाती है। और इन योजनाओं के सफल संचालन में एक तरफ गुजरात सरकार यूनिसेफ जैसी विकास एजेंसिया बेहतर साझेदारी के जरिए लोगों के जीवन में उल्लेखनीय बदलाव लाती हुई दिखाई देती हैं जिसे गुजरात के इन आदीवासी बहुल गांवों से गुजरते हुए देखा जा सकता है और बदलाव को महसूस किया जा सकता है।
बड़ी बात ये है एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्वास्थ्य, शिक्षा और बाल कल्याण से जुड़ी योजनाओं के दायरे में अब भले ही पूरा देश समाहित हो लेकिन आज भी उसका मानक गुजरात ही बना हुआ है। ऐसे में जेहन में ये सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों है कि गुजरात मॉडल की चर्चा थम नहीं रही है तो इसके मूल में वो काम है जिसे गुजरात सरकार, यूनिसेफ, पंचायती राज संस्थाएं और आंगनवाड़ी केंद्र दूर दराज के आदीवासी गांवों में संचालित कर रहे हैं।