लिव इन में रेप और निर्भया रेप में अंतर समझना होगा : कानून विशेषज्ञ

आज की मॉडर्न जिन्दगी में लिव इन रिलेशन बेहद आम होता जा रहा है. लिव इन रिलेशन में रहने का नजरिया अब महानगरों के अलावा अब छोटे शहरों में भी ट्रेंड बनता जा रहा है. ऐसे में लिव-इन रिलेशनशिप अब सोशल टैबू नहीं रह गया है। कानूनी रूप में इसे मान्यता मिल चुकी है।

ऐसे में दिग्गज कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कोई महिला लिव-इन रिलेशनशिप के फेल होने पर या शादी का वादा पूरा न होने पर अपने पार्टनर पर रेप का आरोप लगाती है तो पुलिस को पहले इसे वादाखिलाफी के रूप में देखने की जरूरत है।

बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस (रिटायर्ड) वीएम कनाडे कहते हैं, सुप्रीम कोर्ट लिव-इन को मान्यता दे चुका है। इस तरह का कानून महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाता है। लिव-इन एक कॉन्सेप्ट है जिसे पश्चिमी देशों से हमने लिया है और अब यह सोशल टैबू भी नहीं रह गया है।

यह दिखाता है कि रेप के मामलों में कुछ सामान्य कानून जो अमल में लाए जा रहे हैं उन्हें खत्म करने की जरूरत है और कुछ विशेष मामलों में नए कानून की जरूरत है।

कानून विशेषज्ञों के मुताबिक, दुर्भाग्य से रेप की परिभाषा के तहत वैसी शिकायतों को भी लिया जा रहा है जिसे वादाखिलाफी जैसे सिविल केस में देखे जाने की जरूरत है।

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