आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर सीएम रेखा गुप्ता का तीखा हमला “लोकतंत्र पर लगा था तानाशाही का ग्रहण”

cm Rekha Gupta

(नई दिल्ली): देश में आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 1975 में लागू किए गए आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय करार दिया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनकी सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि यह फैसला सत्ता की लालसा, तानाशाही प्रवृत्ति और असंवेदनशीलता का प्रतीक था।

लोकतंत्र के सूर्य पर लगा था ग्रहण”

रेखा गुप्ता ने कहा, “25 जून 1975 को पूरे देश में ऐसा माहौल बना जैसे लोकतंत्र के सूर्य पर ग्रहण लग गया हो। उस दिन से एक ऐसा अंधकारमय दौर शुरू हुआ, जहां नागरिक अधिकार छीन लिए गए, न्यायपालिका को बांध दिया गया और प्रेस की स्वतंत्रता को बेरहमी से कुचल दिया गया।”

तानाशाही और सत्ता की भूख का प्रतीक

मुख्यमंत्री ने इंदिरा गांधी की सरकार को “क्रूर और सत्ता के प्रति पागल” बताते हुए कहा कि जब जनता गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रही थी, तब सरकार सत्ता बचाने में व्यस्त थी। उन्होंने कहा सत्ता के मोह में सरकार ने लोकतंत्र की जड़ें हिलाकर रख दीं।”

सेंसरशिप, गिरफ्तारियाँ और अत्याचार

गुप्ता ने कहा, “जो सच बोलता था, उसे जेल में डाल दिया गया। पत्रकारों पर सेंसरशिप लगा दी गई और स्वतंत्रता सेनानियों तक को नहीं बख्शा गया। उन्होंने आगे कहा कि “सैकड़ों वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए। छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और विपक्षी नेता बिना मुकदमे के जेल में बंद कर दिए गए।”

कहने को नारी थी, मगर शातिर भारी थी

मुख्यमंत्री ने इंदिरा गांधी पर तीखा हमला करते हुए कहा, “कहने को वो एक महिला थीं, लेकिन चालाकी और सत्ता की भूख ने उन्हें एक तानाशाह में बदल दिया। उन्होंने पूरे देश को एक बंदीगृह बना दिया और लोकतंत्र की आत्मा को कुचल दिया।”

फिर कभी न लौटे वो काले दिन

रेखा गुप्ता ने जनता से अपील की कि “हमें लोकतंत्र की कीमत समझनी होगी और उसे बचाने के लिए सतर्क रहना होगा। हम वो काले दिन कभी दोबारा नहीं लौटने देंगे। उन्होंने युवाओं को भी इतिहास से सीखने की सलाह दी ताकि वे संविधान और लोकतंत्र की रक्षा कर सकें।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

आपातकाल 25 जून 1975 को घोषित किया गया था और यह लगभग 21 महीनों तक चला। इस दौरान संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी गई और हजारों राजनीतिक विरोधियों को बिना मुकदमा चलाए जेल में डाल दिया गया। इतिहासकार इसे भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक मानते हैं।

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