UP News: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सार्वजनिक भूमि पर नमाज अदा करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक भूमि किसी एक समुदाय या धर्म के लिए आरक्षित नहीं की जा सकती। यह सब नागरिकों का समान अधिकार है और किसी धर्म विशेष की गतिविधियों के लिए इसका उपयोग नहीं होना चाहिए।
सार्वजनिक स्थानों पर नमाज़ नहीं
मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि सार्वजनिक सड़कें, पार्क, चौराहे या सरकारी जमीन पर धार्मिक आयोजन या नमाज पढ़ने से आम जनजीवन प्रभावित होता है। यातायात बाधित होता है, शांति भंग की आशंका रहती है और अन्य समुदायों के अधिकारों का हनन होता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि “सार्वजनिक भूमि पर सबका समान अधिकार है, इसे किसी एक पक्ष द्वारा धार्मिक गतिविधियों के लिए कब्जे में नहीं लिया जा सकता।”
दूसरे के अधिकारों पर नहीं हो अतिक्रमण
यह फैसला उन याचिकाओं पर आया, जिनमें सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ने की अनुमति मांगी गई थी। अदालत ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार मौलिक है, लेकिन यह दूसरों के अधिकारों पर अतिक्रमण नहीं कर सकता। निजी या मस्जिद जैसी धार्मिक स्थानों पर नमाज पढ़ी जा सकती है, लेकिन सार्वजनिक भूमि पर नहीं।
फैसले का स्वागत
BJP और हिंदू संगठनों ने फैसले का स्वागत किया। उन्होंने इसे समानता और कानून के शासन की जीत बताया। वहीं, कुछ विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला करार दिया। उन्होंने कहा कि यह फैसला साम्प्रदायिक सद्भाव को प्रभावित कर सकता है।
सभी राज्यों के लिए मिसाल
यह फैसला उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले धार्मिक कार्यक्रमों (नमाज, कथा, जुलूस आदि) पर असर डालेगा। पहले कई जगहों पर विवाद हो चुके हैं। कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी धर्म को सार्वजनिक संसाधनों पर विशेषाधिकार नहीं मिल सकता। यूपी सरकार ने पहले ही सार्वजनिक स्थानों पर अनधिकृत धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाई थी। HC के फैसले से इसे और मजबूती मिली है।