पद से हटाए जाने के बाद राघव चड्ढा का बड़ा बयान, बोले- “मेरी खामोशी को मेरी हार मत समझना”

नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने उपनेता पद से हटाए जाने के एक दिन बाद शुक्रवार को अपनी चुप्पी तोड़ी और पार्टी के भीतर चल रहे घटनाक्रम पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उनकी खामोशी को उनकी हार नहीं समझा जाना चाहिए।

वीडियो जारी कर उठाए सवाल

राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने कहा कि जब भी उन्हें अवसर मिलता है, वे सदन में आम जनता से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं। उन्होंने सवाल किया कि क्या आम लोगों की समस्याओं के बारे में बात करना कोई अपराध है और क्या उन्होंने ऐसा कुछ किया है जिसके कारण उन्हें इस तरह निशाना बनाया जा रहा है।

पार्टी पर लगाए गंभीर आरोप

उन्होंने अपनी ही पार्टी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय से आग्रह किया है कि उन्हें सदन में बोलने का मौका न दिया जाए। चड्ढा के अनुसार, यह कदम न केवल उनके अधिकारों का हनन है, बल्कि उन लोगों की आवाज को दबाने जैसा है जिनके मुद्दे वे उठाते रहे हैं।

“मुझे बोलने से क्यों रोका जा रहा है?”

राघव चड्ढा ने कहा, “मैंने कई ऐसे मुद्दे उठाए जिनसे आम आदमी को फायदा हुआ। इससे पार्टी को क्या नुकसान हुआ? कोई मुझे बोलने से क्यों रोकना चाहता है?” उन्होंने यह भी दोहराया कि वे जनता के हितों के लिए अपनी आवाज उठाते रहेंगे।

पद से हटाने का फैसला और नया नाम

गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी ने बृहस्पतिवार को राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर चड्ढा को उपनेता पद से हटाने का निर्णय लिया था। उनकी जगह पंजाब से राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल का नाम प्रस्तावित किया गया है।

सदन में समय को लेकर भी विवाद

सूत्रों के अनुसार, पार्टी ने यह भी कहा है कि चड्ढा को पार्टी के कोटे से सदन में बोलने का समय न दिया जाए। इस मुद्दे ने विवाद को और गहरा कर दिया है और पार्टी के भीतर मतभेदों की ओर संकेत किया है।

केजरीवाल के करीबी रहे हैं चड्ढा

कभी अरविंद केजरीवाल के करीबी माने जाने वाले राघव चड्ढा पार्टी के प्रमुख युवा चेहरों में शामिल रहे हैं। उन्होंने दिल्ली और पंजाब में संगठन को मजबूत करने और पार्टी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस पूरे घटनाक्रम ने आम आदमी पार्टी के भीतर चल रही आंतरिक खींचतान को उजागर कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले समय में पार्टी की रणनीति और छवि पर असर डाल सकता है।

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