Bihar 9th Schedule of Constitution: बिहार में एक बार फिर से संविधान की 9वीं अनुसूची चर्चा में है। जिसको लेकर बिहार की गठबंधन सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। बिहार सरकार एक बार फिर से केन्द्र सरकार से आग्रह करेगी कि नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की 65 फीसदी की नई सीमा और संशोधित प्रावधानों को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल किया जाए।
बिहार सरकार ने यह फैसला इसलिए लिया है क्योंकि बढ़ाई गई आरक्षण सीमा को कोई कानूनी चुनौती ना दें सके और उसे संवैधानिक सुरक्षा कवच दिया जा सके। अब आपको हम संविधान की 9वीं अनुसूची के बारे में बताते हैं।
क्या है संविधान की 9वीं अनुसूची
यह अनुसूची संविधान अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ी गई थी। संविधान की नौवीं अनुसूची केंद्रीय और राज्य कानूनों की एक सूची है जिसे न्यायालयों में चुनौती नहीं दी जा सकती है। यही वजह है कि लंबे समय से आरक्षण से जुड़े मुद्दों को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठती रहती है। पहले संशोधन में इस अनुसूची में कुल 13 कानूनों को जोड़ा गया था। बाद के विभिन्न संशोधनों के बाद इस अनुसूची में संरक्षित कानूनों की संख्या 284 हो गई।
इन कानूनों को किया गया शामिल
बता दें कि, जिन कानूनों को 9वीं अनुसूची में शामिल किया गया था, उनमें भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन प्रमुख थे। नौंवी अनुसूची की खासियत यह है कि अगर किसी कानून को अंसैवाधिक करार दिया जाता है तो उस कानून को अगर नौंवी अनुसूची में डाल दिया जाए तो वह वैध माना जाता है। साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित कर दी थी।
पीएम को लिखी गई चिट्ठी
इससे पहले इसी साल छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संविधान की नौवीं अनुसूची में नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में बढ़ाए गए आरक्षण के 76 फीसदी कोटे की अनुमति देने वाले दो संशोधन विधेयकों को शामिल करने की मांग की थी। उससे पहले पिछले साल नवंबर में झारखंड सरकार ने भी राज्य सरकार की नौकरियों में आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 77 फीसदी कर दिया था और उसे प्रस्ताव को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी थी।