विपक्ष हो या पक्ष…तीसरे पक्ष पर टिकी हुई है निगाहें

सहमती,असहमती और विसम्मती। सत्ता पक्ष,विपक्ष और तीसरा पक्ष। यानी जो नरेंद्र मोदी से सहमत हैं, उनकी नीतियों के पैरोकार हैं, 2024 के बाद भी मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में तीसरा मौका देना चाहते हैं। वो एनडीए के खेमे में हैं और उनका जुटान बारिश और बाढ़ से बेहाल देश की राजधानी दिल्ली में है।

सहमती,असहमती और विसम्मती। सत्ता पक्ष,विपक्ष और तीसरा पक्ष। यानी जो नरेंद्र मोदी से सहमत हैं, उनकी नीतियों के पैरोकार हैं, 2024के बाद भी मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में तीसरा मौका देना चाहते हैं। वो एनडीए के खेमे में हैं और उनका जुटान बारिश और बाढ़ से बेहाल देश की राजधानी दिल्ली में है। जो नरेंद्र मोदी से असहमत हैं, उनकी नीतियों के विरोधी हैं, 2024में हर कीमत पर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाहते हैं, उनका जुटान कर्नाटक की राजधानी बेंग्लुरू में है।

वहीं कर्नाटक जो चंद माह पहले तक दक्षिण में भाजपा का दुर्ग हुआ करता था, दक्षिण का प्रवेश द्वार माना जाता था। लेकिन अब उस बेंग्लुरू पर यानी कर्नाटक पर कांग्रेस का कब्जा है और विपक्षी एका की जमीन के लिए मुफीद माना जा रहा है।

संख्या कम बेसी हो सकती है। किसी के पक्ष में 24तो किसी के पक्ष में 30का गणित हो सकता है या संभव है आंकड़े कम या ज्यादा हों। अगर का बा के विश्लेषण पर इस परिपाटी को तौला जाये बिहार में का बा,मुंबई में का बा, एमपी में का बा की तर्ज पर यह पूछा जाये कि ​2024में का बा। तो जवाब यही होगा कि गुणा-गणित चालू बा, खेला बाकी बा।

….लेकिन इन सब के बीच यह भी तय हो गया है कल तक जो कहा करते थे कि कन्याकुमारी से लेकर काश्मीर तक और अटक से लेकर कटक तक नरेंद्र मोदी का साम्राज्य है और वो अजेय हैं वो भी लाईक माईंडेड पार्टियों से सहमती की बुनियाद टटोलने लगे हैं और दिल्ली में बुलाकर उन्हें एनडीए के खेमे में शामिल करने की कवायद हुई है। कहा जा रहा है बेंग्लुरू में जो जुटे हैं वो परिवार वादी हैं। परिवार को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

बेंग्लुरू में बैठक कर रहे विपक्षी नेता भले ही ये कह रहे हों कि यूनाईटेड वी स्टैंड… लेकिन भाजपा के सबसे बड़े प्रचारक और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैठक से ठीक पहले ये कहा है कि बेंगलुरु में जुटे करप्ट लोग, और यह बेईमानी का सम्मेलन। सुशील मोदी ने भी नीतीश कुमार पर तंज करते हुए कहा है कि विपक्षी एकता की पहली और दूसरी बैठक के बीच मात्र 24दिनों के भीतर नीतीश कुमार हाशिये पर आ गए, शरद पवार की पार्टी टूट गई, कांग्रेस ड्राइविंग सीट पर आ गई।

सुशील मोदी ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि बेग्लुरू में यूपीए की चेयरपर्सन रही सोनिया गांधी ने बैठक का कमान संभाल लिया है और आपको याद होगा कि कैसे अटल बिहारी वाजपेयी की शाईनिंग इंडिया वाली सरकार चुनावी रण में जा रही थी और अचानक सोनिया गांधी के कमान संभालने के बाद वाजपेयी का विजय रथ पटरी से उतर गया था और उसके आगे 10साल तक मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने।

भाजपा ने सोनिया गांधी पर हमला इसलिए भी तेज कर दिया है क्योंकि भाजपा को लग रहा है सोनिया गांधी ने यदि विपक्षी एका का कमान संभाल लिया तो कहीं अच्छे दिन की सरकार का दावा जुमला न साबित हो और भाजपा के अच्छे दिन बुरे दिन में बदल जाये।

खैर ये तो हुई पक्ष व विपक्ष की बात यानी सहमती,असहमती वालों की बात लेकिन लोकतंत्र में विसम्म्ती रखने वालों यानी वॉयस आॅफ डिसेंट का भी अपना महत्व है। और वर्तमान परिस्थती में भी कुछ ऐसा ही माहौल बनता दिख रहा है यानी कुछ लोग, कुछ नेता और कुछ दल ऐसे भी हैं जो न तो मोदी को हटाने के ​मुहिम में शामिल हुए हैं और न ही मोदी को बनाए रखने के मुहिम में बल्कि उनकी डपली अलग है और राग भी अलग है। इन दलों में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी, जगन मोहन रेड्डी की वायएसआर कांग्रेस पार्टी, बादल की शिरोमणी अकाली दल, नवीन पटनायक की बीजू जनता दल जैसे कई दल हैं जो न तो इस खेमे में हैं और न उस खेमे में। वैसे अभी इस बाबत कुछ कहना जल्दबाजी होगी कि ये किधर जायेंगे या फिर विसम्मती की आवाज बुलंद कर मोदी हटाने वालों का भी खेल खराब करेंगे और मोदी को जिताने वालों की भी। यानी अनप्रेडि​कटेबल बने रहेंगे और राजनीति संभावनाओं का खेल है की बुनियाद को और मजबूत करेंगे

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