भारत की बेटियां गर्व और सम्मान भाग-2में आज आप भारत की उन बेटियों के बारे में जानेंगे जिनमें से किसी ने अपनी उम्र को मात देकर इतिहास रचा तो किसी ने उस क्षेत्र को अपना करियर बनाया जिसमें अभी तक सिर्फ पुरुषो का ही वर्चस्व था ।आज बात उन बहादुर महिला ऑफिसर की जिन्होंने उठाया महिला सुरक्षा का साहसी कदम। हम बताएंगे उन संघर्षशील महिलाओं के बारे में जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी है और अपने जीवन की चुनौतियों का डटकर सामना किया क्योंकि उनना मानना था कि डर के आगे जीत है-
कामयाबी उन्हीं को मिलती है जिनके सपनो में जान होती है।
पंखों से कुछ नहीं होता,हौंसले से उड़ान होती है।।
रेणु सिंघी
सच है यदि सच्चे मन और मजबूत इरादों के साथ किसी कार्य का श्रीगणेश किया जाए तो उसमें सफलता की गारंटी सौ प्रतिशत होती है। फिर भले ही आपके सामने बढ़ती उम्र की चुनौती और पारिवारिक जिम्मेदारी ही क्यों ना हो।विपरित परिस्थितियां को भी आप अपना हथियार बना लेते हैं औऱ फिर कामयाबी आपके कदम चूम लेती है।कुछ ऐसा ही किया जयपुर की रहने वाली 57वर्षीय रेणु सिंघी ने,जिन्होंने बढ़ती उम्र से बेफिक्र होकर लंदन में 1500किमी साइक्लिंग का सफर 124घंटे 32मिनट में तय कर रच दिया इतिहास। रेणु ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला साइक्लिस्ट हैं। आपको बता दें लंदन-एडिनबर्ग दुनिया के सबसे कठनि और चुनौतीपूर्ण सेल्फ सपोर्टेड साइकिल राइडस में से एक हैं। इसमें 14,300मीटर का एलिवेशन गेन करना होता है। इसकी ऊंचाई माउंट एवरेस्ट से भी ज्यादा है।रेणु सिंघी जी के हौंसले को देश सलाम करता है।।
श्वेता चौहान
देश की बहादुर बेटी श्वेता चौहान सेंट्रल दिल्ली की पहली महिला डीसीपी बनकर देश का नाम ऊंचा किया। वो महिलाओं की सुरक्षा के लिए बेहद गंभीर हैं और हमेशा इसे प्राथमिकता पर रखती हैं। श्वेता देश की बेटियों, महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल तैयार करना चाहती हैं। जिसके लिए उन्होंने नई और बहुत ही काबिले तारिफ पहल की है। छिनैती, डकैती छेड़छाड़ जैसे मामलों पर अंकुश लगाने के लिए श्वेता गुलाबी स्कूटी पर महिला पुलिस के साथ पेट्रोलिंग करती हैं। जिसका नाम वीरा दस्ता रखा गया है। देश की बहादुर बेटी श्वेता चौहान के हौंसले को देश सलाम करता है।।
नैंसी कतनौरिया
देश की उन्नति और तरक्की का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि आज महिलाएं सभी विधाओं में पुरुषों के साथ कदमताल करती नज़र आ रही हैं। इसी बात को सार्थक करते हुए हमीरपुर की 22साल की नैंसी कतनौरिया ने एंबुलेंस चालक के तौर पर अपने करियर को चुना। नैंसी ने हिमाचल पथ परिवहन निगम से ट्रेनिंग ली है। वो अभी नूरपुर में एंबुलेंस ड्राइवर के तौर पर कार्य कर रही हैं। नैंसी बताती है कि उन्हें बचपन से गाड़ी चलाने का शौक था। वो जब 7वीं क्लास में थीं तब से ही टू विलर गाड़ी चलाना शुरू कर दी थीं। नैंसी के हौंसले को देश सलाम करता है।
सरिता देवी
जीवन में मुश्किलें कभी कभी इस कदर हावी हो जाती हैं कि हौंसला दम तोड़ने लगता है।लेकिन ऐसे हालातों और परिस्थितियों में सफलता का रहस्य छुपा होता है। इसी सोच को अक्षरश:साकार किया बिहार की रहने वाली सरिता ने। सरिता भारत की पहली महिला ई-रिक्शा चालक हैं। सरिता के पति शंकर बेरोजगार हैं और दिहाड़ी मजदूरी करके बमुश्किल घर चला पाते थे। जिसको देखते हुए उनकी पत्नी सरिता ने ई-रिक्शा खरीदकर खुद काम करने की ठानी।ई-रिक्शा से पैसे कमाकर वो इसका लोन भी चुका रही हैं और साथ ही एक सिलाई मशीन भी खरीदा है। जिससे खाली समय में वो कपड़े सिलकर भी पैसे कमा रही हैं। सरिता ने बहादुरी के साथ अपनी जिंदगी की समस्याओं का डटकर सामना किया और अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर किया। सरिता की प्रेरणा से यकिनन देश वो महिलाएं प्रभावित होंगी जिन्होंने उम्मीद खो रखी है।
लक्ष्मी जाधव
नैंसी और सरिता की तरह ही लक्ष्मी जाधव भी ऐसी ही एक बहादुर महिला हैं। जिन्होंने पुरुषों के समझे जाने वाले क्षेत्र में काम करने की ठानी। लक्ष्मी मुंबई की बेस्ट बस चलाने वाली पहली महिला ड्राइवर हैं। लक्ष्मी ऑटो रिक्शा चलाने वाली पहली भारतीय महिला भी हैं। उन्होंने ट्रेवल एजेंसी में भी काम किया है। जहां वो बीएमडब्ल्यू और मर्सिडीज जैसी लग्जरी गाड़ियां चलाया करती थी। बता दें कि मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली बेस्ट बस की स्थापना 1926 में हुई थी। इन 96 साल में बेस्ट के पास कोई महिला बस ड्राइवर नही थी। लेकिन अब बेस्ट बस को लक्ष्मी के रूप में एक काबिल बस ड्राइवर मिल गई है।
इन सभी बेटियों के जज्बों और हौंसले को देश सलाम करता है। इस सीरीज के अगले भाग में ऐसी ही अन्य बाहुदर महिलाओं के बारे में बताएंगे जिन्होंने अपनी काबलियत से देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया ……………..