पटना: नेता और नेता पुत्र सियासी मुलाकात करते रहे हैं। भेंट मुलाकात भी होती है। स्वागत सत्कार भी और फोटो सेशन भी। इन मुलाकातों को शिष्टाचार भेंट कहा जाता है और राजनीति से इंकार किया जाता रहा है। लेकिन नेता और नेता पुत्र भी समझते हैं ये मुलाकात अनायास ही नहीं हुई है और सिर्फ और सिर्फ शिष्टाचार जैसा तो कुछ नहीं होता है। ये मुलाकातें सियासी हुआ करती हैं और इनके मूल में सियासत ही होता है।
बिहार की राजनीति पटना में पिछले बुधवार एक ऐसी ही सियासी मुलाकात हुई जिसमें दो नेता पुत्र मिले। स्वागत सत्कार भी हुआ और फोटो सेशन भी लेकिन राजनीति से इंकार किया जाता रहा। लेकिन कहते है न कि राजनीति संभावनाओं का खेल है और इसी संभावनाओं के खेल में जीत हार के लिए बिछाई गई चौसर पर सियासी अटकल का बाजार गर्म होता है और उसके सियासी मायने भी निकाले जाते हैं..साथ ही उभर पड़ता है नेताओं के इस सियासत के पीछे छिपा जनता का दर्द जो सियासी बिसात में कहीं दब जाया करता है।
तो पड़ताल करते हैं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के पुत्र और वर्तमान उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पुत्र और बाला साहब ठाकरे के पोते आदित्य ठाकरे के बीच हुई मुलाकात की। बुधवार को आदित्य ठाकरे पटना पहुंचे। तेजस्वी यादव से मुलाकात की। आत्थ्यि सत्कार की परंपरा रही है। इसलिए तेजस्वी यादव ने आदित्य ठाकरे के लिए गुड़ की रसमलाई, सैंडविच, कुछ नमकीन की व्यवस्था की। इस दौरान आदित्य ठाकरे ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी मुलाकात की। नाश्ता खत्म होने के बाद तेजस्वी यादव खुद लेकर एक अणे मार्ग पहुंचे। जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आदित्य ठाकरे का स्वागत किया। मुख्यमंत्री आवास पर भी आदित्य ठाकरे की आवभगत हुई। चाय परोसा गया। नीतीश कुमार ने आदित्य ठाकरे से उनके पिता के पिता उद्धव ठाकरे के बारे में हालचाल लिया। साथ ही युवा ठाकरे को अनुभवी नीतीश कुमार की तरफ से टिप्स भी और कहा गया कि कुछ नेताओं की पार्टी छोड़ जाने से उनके साथ पार्टी नहीं चली जाती है। आपको मजबूती से काम करना है। हम लोग आपके साथ हैं।
लेकिन जब लालू प्रसाद के पुत्र तेजस्वी यादव और बाला साहब के पोते आदित्य ठाकरे का फोटो सेशन चल रहा था और खुशमिजाज तस्वीरें सामने आ रही थी महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में रह रहे पूरबियों जिसे वहां भैय्या कह के संबोधित किया जाता रहा है याद आ रहे थे बाला साहब को लालू को दिया गया वो बयान जिसमें बुजुर्ग ठाकरे ने लालू की आलोचना करते हुए अपने मुखपत्र सामना में लालू को लफंदर बताते हुए कहा था कि उनका दिमाग ठिकाने पर नहीं है। यहां तक की उन्होंने सामना में लफंदर लालू शीर्षक से एक संपादकीय लिखा था जिसमें बाल ठाकरे ने लालू की आलोचना की थी। लालू यादव और उनके कुनबे को बिहार से तड़ीपार कर दिया,कुंठा के चलते उनका भेजा घूम गया, बकवास कर रहे हैं लालू,लालू को नया सवेरा कैसे भाए, बिहार के विकास को कैसे पचाएं जैसी शब्दावली का उपयोग किया था।
वे यहीं कहां रूके। वर्ष 2008 में बाला साहब ठाकरे ने इसी सामना में लिखा था एक बिहारी सौ बीमारी। अखबार ने लिखा कि बिहार में भ्रष्टाचार की गंगा बहती है और इसी वजह से ही गंगा मैली हो गई है। वहां गरीबी, भूख, बेरोजगारी और जातिवाद के साथ अराजक स्थिति है।
केवल बाला साहब ठाकरे ही क्यों पूरा ठाकरे परिवार ही समयसमय पर लालू परिवार और बिहारी अस्मिता पर सवाल खड़ा करते रहा है। शिवेसेना हो या शिवसेना से अलग हुई मनसे हमेशा पूरबियों के खिलाफ, बिहार वासियों के खिलाफ महाराष्ट्र वासियों के मन में जहर बोते रहे हैं और मारपीट की घटनायें तो आम रही हैं।
इस पड़ाव पर दो घटनाओं की चर्चा लाजिमी है। सबसे पहले आपको लिए चलते हैं उस घटना की ओर जिसने पूरे बिहार को हिला कर रख दिया था। वर्ष 2008 की बात है। दिन 27 अक्टूबर 2008। बिहारी युवा राहुल राज को एनकाउंटर में मुंबई में इसलिए मार गिराया गया था कि वह बिहारियों से मारपीट का बदला लेने कट्टा लेकर मुंबई पहुंच गया था। तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद दोनों ने इस घटना की निंदा तो की लेकिन आज भी परिवार न्याय की बाट जोह रहा है।
पिता कहते हैं कि महाराष्ट्र के नेताओं ने वहां बिहारियों के खिलाफ जो नफरत फैलायी हुई है उसी का शिकार मेरा बेटा हो गया। उस समय रेलवे की परीक्षा में बिहारी छात्रों को मुंबई में बेरहमी से पीटा गया था। उसमें मेरे बेटे का दोस्त भी था। दोस्तों ने पटना आकर जो बातें बतायीं उससे मेरे बेटे के दिल में आग लग गई। इसके बाद उसका खून खौल उठा। वह मुंबई चला गया। मेरे बेटे को वहां फर्जी मुठभेड़ में मारा गया।
पिछले साल ही बिहार के प्रतिभाशाली अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के मुंबई में आत्महत्या की खबरें आईं। मामला अदालत में हैं लेकिन जिन लोगों और जिस परिवार और जिस नेता की इस घटना में संलिप्तता को लेकर आशंका जाहिर की गई वो किसी से छिपा नहीं है।
खैर सियासत में बातें भी होती हैं और मुलाकातें भी और उसके मायने भी राजनीतिक ही होते हैं न कि नेता और नेता पुत्र सिर्फ शिष्टाचार वश मुलाकात करते हैं और खिलखिलाते हुए फोटो सेशन में शामिल होते हैं। जाहिर है आदित्य ठाकरे पटना पहुंचे थे। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से मुलाकातें हुईं। तेजस्वी यादव के संग वे नीतीश कुमार से मिलने गए। लेकिन इस मुलाकात के सियासी मायने हैं और उसी के अनुरूप ही मतलब निकाला जाएगा।
नीतीश कुमार इन दिनों विपक्षी एकजूटता की बात कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी और भाजपा विरोधी मोर्चे को खड़ा करने की कवायद में लगे हुए हैं और उधर ठाकरे परिवार भी मुंबई और महाराष्ट्र में हारी हुई सियासी पारी को जीत में बदलना चाहता है। बीएमसी का चुनाव सामने हैं और जाहिर है मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में इन पूरबियों, भैय्यों की अच्छी खासी तादाद है। तो युवा आदित्य ठाकरे बीएमसी चुनाव (BMC Elections) में उत्तर भारतीय वोटों की ताकत को देखते हुए सियासी गठजोड़ बनाने बिहार पहुंचे थे।
दोनो के अपनेअपने स्वार्थ हैं और इस भेट मुलाकात के अलगअलग निहितार्थ। किसको क्या हासिल होगा ये तो आने वाले वक्त ही तय करेगा लेकिन मूल सवाल बना हुआ है मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में गाहे बेगाहे ठाकरे परिवार का निशाना बन चुके या बन रहे उन पूरबियों का क्या? जाहिर है सवाल सामने है और जवाब भविष्य के गर्त में है ऐसे में और भी मुलाकातें होंगी। मुलाकात की वो खुशमिजाज तस्वीरें भी सामने आयेंगी लेकिन साथ ही उठते रहेंगे सवाल।