संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: तारीख 10 मई 1978, क्या हुआ था खास, जिसको लेकर अधीर रंजन चौधरी हो रहे हैं अधीर। दरअसल मानसून सत्र के 7वें दिन जब बाकी दिनों की तरह ही आज भी जैसे ही संसद शुरू हुई विपक्षी दल के सांसद मणिपुर के मसले पर शोर शराबा करने लगे।
इस बीच आसन के तरफ से यानी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की तरफ से पूछा गया कि आप प्रश्नकाल को चलाना चाहते हैं या नहीं चलाना चाहते हैं। प्रश्नकाल महत्वपूर्ण समय होता है…। विपक्षी सदस्यों ने जवाब दिया, चलाना चाहते हैं सर।
लेकिन इस बीच कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी अधीर हो गये और कहा कि हमारी कुछ मांग है सर, मैं एक छोटी सी बात करना चाहता हूं। चौधरी ने कहा, 1978में सर, 10मई को इस सदन विपक्ष ने एक अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था तो उसी दिन चर्चा शुरू हो गई थी। अधीर रंजन चौधरी के प्रश्न पर लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि आपने प्रस्ताव रखा है, मैं व्यवस्था दूंगा।
लोकसभा अध्यक्ष के ऐसा कहने के बाद भी सदन में विपक्षी सदस्यों का हंगामा जारी रहा। हालाकि सरकार की तरफ से पक्ष रखते हुए संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि सर, नियम के अनुसार अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के लिए 10दिन का समय है, आप जब भी तय करेंगे, हम चर्चा के लिए तैयार हैं। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर विपक्ष को लगता है कि उनके पास बहुमत है तो हमारा बिल गिरा दें, निरस्त कर दें।
ये तो रही पक्ष विपक्ष की नोकझोंक लेकिन मूल सवाल यह है कि आखिर 10 मई, 1978 को ऐसा क्या हुआ था जिसको लेकर कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी इतने अधीर हो रहे हैं और आसन को वो तारीख याद दिला रहे हैं।
इतिहास के पन्नों को पलटें और कैलेंडर को 10, मई 1978की ओर ले जायें तो क्या कहती है जीसी मल्होत्रा की किताब
लोकसभा के पूर्व महासचिव जीसी मल्होत्रा ने अपनी किताब में लिखा है, वह 6वीं लोकसभा थी। आजादी के बाद पहली बार लोगों ने गैर-कांग्रेसी सरकार को सत्ता सौंपी थी। नई बनी जनता पार्टी ने शानदार जीत हासिल की थी। पूर्व कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे। उनके कार्यकाल में दो बार अविश्वास प्रस्ताव आया। कांग्रेस-I नेता स्टीफन ने 10मई 1978को अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। उन्होंने सदन में कहा कि मौजूदा हालात को देखते हुए साफ है कि सत्ता में आने के 13महीने बाद भी जनता पार्टी किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं रही। सामाजिक तनाव बढ़ गया और केंद्र-राज्यों के बीच नई टेंशन पैदा हो गई।
बहस के दौरान सदस्यों ने रखी राय
मल्होत्रा लिखते हैं कि कुछ देर बाद स्टील और माइन्स मंत्री बीजू पटनायक ने कहा था कि पहली बार देश में 30साल बाद सबसे लोकतांत्रिक कैबिनेट और सरकार बनी है। जनता पार्टी के साथ समस्या है क्योंकि 10पार्टियां साथ आई हैं और उन्हें एक ताकतवर पार्टी बनने में थोड़ा समय लगेगा। 11मई 1978को रक्षा मंत्री जगजीवन राम बोले। प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने कहा कि जनता पार्टी की सरकार में देश में कई बदलाव हुए हैं। प्रेस को पूरी आजादी है। पहली बार चुनावों में रेडियो पर सत्तारूढ़ पार्टी के बराबर विपक्ष को बोलने की आजादी मिली है।
28 सदस्यों ने इस अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लिया था। 10 और 11 मई 1978 को पूरे 10घंटे 19मिनट तक चर्चा चली थी। बाद में वाईबी चव्हाण ने अगले ही साल दूसरा अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। यह प्रस्ताव 10 जुलाई 1979 को पेश किया गया और अगले दो दिन इस पर बहस हुई। उस समय जनता पार्टी में काफी असंतोष फैला हुआ था। आखिर में 15जुलाई 1979को पीएम मोरारजी देसाई ने राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी को अपना इस्तीफा सौंप दिया।
मौजूदा वक्त में भी इंडिया नीत विपक्ष द्वारा नरेंद्र मोदी की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। लोकसभा अध्यक्ष ओमबिरला ने विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है और नियमानुसार बहस कराने की बात कही है। नियम ये कहता है कि अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस स्वीकार करने के 10दिन के अंदर लोकसभा अध्यक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पर बहस कराना अनिवार्य है।
हालांकि, विपक्षी सदस्यों की राय है कि सरकार जानबूझकर अविश्वास प्रस्ताव पर बहस नहीं करा रही है और अविश्वास प्रस्ताव के बीच ही नियमो को ताख पर रखकर बिल जाया जा रहा है और बिना बहस के पास भी कराया जा रहा है। इस पर राघव चड्ढा ने सरकार पर तीखा हमला बोला है और कहा है कि संसदीय परंपरा और कानून यह बताते हैं कि जब भी अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में आता है तो माननीय स्पीकर उसे स्वीकार करते हैं। जो कोई भी बिल सदन के अंदर लाया जाता है उस पर मतदान नहीं किया जाता जबतक की अविश्वास प्रस्ताव पर कोई फैसला नहीं लिया जाता।
ऐसे में कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी का अधीर होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि वो लोकसभा अध्यक्ष को 10 मई, 1978 की याद दिला रहे हैं और चाहते हैं कि लोकसभा अध्यक्ष बिना किसी विलंब के अविश्वास प्रस्ताव पर बहस करायें और संसद का गतिरोध समाप्त हो।