‘टुकड़े टुकड़े दिन बीता और धज्जी धज्जी रात मिली’ – मीनाकुमारी के जन्म दिन पर विशेष

मीना कुमारी की निजी जिंदगी खुद में एक ऐसा फ़लसफ़ा है, जिस पर से रहस्य की चादर शायद कभी ना हट पाए…ट्रेजडी क्वीन के नाम से मशहूर मीना कुमारी की जिंदगी में ट्रेजडी एक ऐसा अंधेरा बन कर आई जो आखिरी सांस तक उनके साथ रही… फ़टेहाली में पैदा हुई एक लड़की, सिल्वर स्क्रीन की मल्लिका तो बनी, लेकिन जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर किस्मत ने एक बार फ़िर से उसे उसी फ़टेहाली की स्थिति में लाकर मौत के मुंह में धकेल दिया…. बस इतनी ही सी हैं मीनाकुमारी की कहानी…. हुस्न और अदाकारी की इस मल्लिका के बारे में कहने को तो बहुत कुछ है , लेकिन उस बहुत कुछ का सारांश यहीं है कि एक्टिंग और खूबसूरती की इस रानी के हाथ पैदा होते वक्त भी खाली थे और मरते वक्त भी…ट्रेजडी क्वीन की कुल साढ़े उन्तालीस साल की जिंदगी ट्रेजडी की एक ऐसी गाथा है जिसे सुनकर किसी की भी आंखे गीली हो जाएंगी

मीना कुमारी की जिंदगी को, एक एक्ट्रेस और एक पत्नी से ज्यादा एक प्यासी प्रेमिका और एक भटकती -गुमराह होती हुई और कदम कदम पर धोखा खाती हुई औरत के रूप में देखना ज्यादा सही होगा…1 अगस्त, 1932 को मुंबई की एक मलीन बस्ती में महजबी बानो का जन्म हुआ था …. इस महजबी बानो को दुनिया ने ट्रेजडी क्वीन के नाम से बाद में जाना, लेकिन इनकी जिंदगी में ट्रेजडी इनके पैदा होते ही शुरू हो गई थी…. महजबी का जन्म मुंबई के एक अस्पताल में हुआ था…. इनके रसिक मिजाज पिता अलीबख्श एक फ़टेहाल आर्टिस्ट और फ़्लॉप म्यूजिशियन थे…अली बख्श के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वो अस्पताल का बिल चुका सके. इसलिये वो अपनी नवजात बच्ची को अस्पताल में ही छोड़ कर भाग गए….हांलांकि कुछ घंटों बाद जब उन्हे पता लगा कि किसी ने अस्पताल का बिल भर दिया है तो वापस आए और अपनी बेटी को लेकर घर गए…. बहुत कम लोगों को ही मालूम होगा कि मीना कुमारी की मां हिन्दू थी…. उनका नाम था प्रभावती देवी थी, और वो रविन्द्र नाथ टैगोर की नातिन थी.. अलीबख्श के साथ शादी करने के बाद प्रभावती देवी ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया था.

मीना के पिता अलीबक्श के पास आमदमी का कोई मुकम्मल जरिया नहीं था…. कमाई के लिए वो अपनी सात साल की बेटी महजबी बानों को फ़िल्म इंडस्ट्री की दहलीज पर लेकर आए…उस समय डॉयरेक्टर विजय भट्ट ने महजबी को अपनी फ़िल्म में चाइल्ड आर्टिस्ट का रोल दिया….यहां से शुरू हुआ महजबी यानी मीना कुमारी का सफ़र ..

महजबी बानो ने जब मीना कुमारी के नाम से एक्टिंग करना शुरू किया तो उनके पास बहुत अच्छी फ़िल्में नहीं थी.. कुछेक धार्मिक फ़िल्में मसलन वीर घटोत्कच, श्री गणेश महिमा, और अल्लादीन जैसी फ़िल्मों को छोड़ दे तो मीना के पास ऐसी कोई फ़िल्म नहीं जिससे उन्हे एक्सपोजर मिल सके….मीना कुमारी को पहला एक्सपोजर मिला विजय भट्ट की फ़िल्म बैजू बावरा से …ये फ़िल्म इतनी बड़ी हिट साबित हुई और मीना कुमारी के काम की इतनी सराहना हुई कि इस फ़िल्म के लिए मीना कुमारी को फ़िल्म फ़ेयर के बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला….इसके बाद मीना कुमारी ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा….बैजू बावरा की सफ़लता के बाद फ़िल्म इंडस्ट्री उनकी एक्टिंग और खूबसूरती का लोहा मान चुकी थी … इस फ़िल्म के बाद मीना कुमारी की परिणिता, दायरा और दिल अपना और प्रीत पराई जैसे लगभग सभी फ़िल्में हिट हुई…

1962 में आई गुरूदत्त की फ़िल्म साहब बीवी और गुलाम को मीना कुमारी का बेस्ट वर्क माना जा सकता है … कहते हैं कि इस फ़िल्म में छोटी बहू के किरदार में मीनाकुमारी ने खुद अपनी कहानी को पर्दे पर उतार दिया था… फ़िल्म क्रिटिक्स की माने तो पर्दे पर ऐसा किरदार आज तक किसी हिरोइन ने नहीं निभाया… किसी मालूम नहीं था कि अपने पति की मुहब्बत को पाने के लिए शराबी बनी छोटी बहू की कहानी मीना कुमारी की खुद की जिंदगी के अक्स में ढल जाएगी…इस फ़िल्म में छोटी बहू ने अपने पति को पाने के लिए सबकुछ किया…. असल जिंदगी में भी मीना कुमारी सच्ची मुहब्बत की तलाश में शराबी बन गई थीं..

ये वो समय था जब बॉलीवुड के एक दौर का खात्मा हो रहा था.. और एक नए दौर की शुरूआत हो रही थी.. लेकिन मीना कुमारी बाद के दौर में भी हिट रहीं…… फूल और पत्थर, दिल एक मंदिर, और काजल सरीखी ब्लॉक बस्टर फ़िल्में देकर मीना कुमारी ने ये साबित कर दिया वो एक कालजयी एक्ट्रेस हैं …. 1964 में आई केदार शर्मा की फ़िल्म चित्रलेखा में मीना कुमारी ने एक बार फ़िर से साबित किया कि एंक्टिंग में उनका कोई सानी नहीं है…. चित्रलेखा एक दार्शनिक फ़िल्म थी, जिसकी थीम थी सत्य-असत्य और पाप-पुण्य की खोज.. इस फ़िल्म में मीनाकुमारी का किरदार एक ऐसी महिला का था जो जीवन का हर सुख छोड़कर ईश्वर की तलाश में चली जाती है .. लेकिन वहां जाकर वो देखती है कि खुद को ईश्वर का दूत कहने वाले लोग ज्यादा पापी हैं ……. इस सच से सामना होने के बाद चित्रलेखा वापस उसी भौतिकतावादी संसार में वापस लौट आती है जहां से वो गई थी …

मीनाकुमारी की लगभग हर महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों के बारे में तो बात हो गई, लेकिन पाकीजा का जिक्र अभी तक नहीं हुआ ..फ़िल्म पाकीजा में मीनाकुमारी के काम करने की कहानी किसी फ़िल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है… उस पूरी कहानी के बारे में हम आपको बताएंगे, लेकिन उससे पहले जरा इस फिल्म के एक गाने इन्ही लोगों ने और इसकी शूटिंग की कहानी को भी जान लीजिए …इस गाने को शूट करते समय मीना कुमारी शराब की पूरी तरह से शिकार हो चुकी थी .. इस शूटिंग के दौरान उनकी तबियत अचानक बिगड़ गई.. लेकिन शूटिंग तो होनी ही थी .. अब इस गाने को कंप्लीट करने के लिए मीनाकुमारी के डुप्लीकेट की तलाश शुरू हुई.. ऐसी डुप्लिकेट जिसकी कद काठी तो मीना कुमारी की तरह हो, और जो डांस भी मीना कुमारी की तरह कर सके…. वो तलाश जाकर खत्म हुई पद्मा खन्ना पर

जब पद्मा खन्ना पर ये गाना फ़िल्माया गया तो उन्हे एक घूंघट उढ़ा दिया गया…. और गाने का अधिकतर हिस्सा लॉन्ग शाट और बैक से फ़िल्माया गया.. कुल मिलाकर ये गाना इस तरह से फ़िल्माया गया कि चेहरा कम से कम दिखाई दे..

फ़िल्म पाकीजा मीना कुमारी का वो दर्द था जो आखिर में उनकी मौत का कारण बना..

मीना कुमारी बला की खूबसूरत तो थी ही , इसीलिए बॉलीवुड में उनके चाहने वालों की कोई कमी भी नहीं थी…. बैजू बावरा फ़िल्म के दौरान भारत भूषण , मीना कुमारी पर हजार जान से आशिक हो गए , लेकिन मीना कुमारी ने उनकी मुहब्बत को ठुकरा दिया..इसी तरह से राजकुमार भी मीनाकुमारी के इश्क में पड़ चुके थे ….. राजकुमार के बारे में तो यहां तक कहा जाता है कि फ़िल्म पाकीजा की शूटिंग के दौरान वो जब भी मीना कुमारी के सामने आते तो अपने डायलॉग तक भूल जाते थे.. दर-असल मीनाकुमारी ने अपने पिता का ऐसा चरित्र देखा था कि उन्हे पुरूष जाति से चिढ़ हो गई थी .. मीना कुमारी के पिता एक अय्याश किस्म के इंसान थे.. बेटी के पैसों पर ऐश करना उनका काम था …. अपने पिता का ये रवैया देख कर मीना कुमारी ने किसी भी सुख की कल्पना करनी छोड़ दी थी .. अब उनको दुख में सुख की अनुभूति होने लगी… लेकिन पुरूषों से मीना कुमारी की नफ़रत उस समय खतम हुई जब वो कमाल अमरोही से मिली… 1952 में इन दोनों लोगों की मुलाकात हुई और 1953 में इन्होने शादी कर ली….. कमाल अमरोही और मीनाकुमारी की शादी के सिर्फ़ एक ही गवाह थे- वो थे जीनत अमान के पिता अमान साहब ….हांलांकि किस्मत ने एक बार फ़िर से मीनाकुमारी के साथ मजाक किया था क्योकि उन्हे कमाल अमरोही की दूसरी बीवी होने का दर्ज़ा मिला था …कमाल अमरोही मीना कुमारी से करीब पंद्रह साल बड़े थे , और उनकी एक शादी पहले भी हो चुकी थी …इसी साल कमाल अमरोही ने अपने मीनाकुमारी के रिश्ते पर एक फ़िल्म बनाई जिसका नाम था दायरा..

यहां कहानी को रोक कर आपको एक घटना बताना चाहूंगा… उस समय मीना कुमारी की ख्याति कितनी थी इसका अंदाज़ा आप एक घटना से लगा सकते हैं.. एक बार कमाल अमरोही और महबूब खान गवर्नर से मिलने गए थे … गवर्नर साहब महबूब खान तो पहचानते थे , लेकिन वो कमाल अमरोही को नहीं पहचानते थे ….. महबूब खान ने कमाल खान को गवर्नर से ये कहते हुए मिलवाया कि कि ये हैं कमाल खान-मीना कुमारी के पति .. कहते हैं कि इस घटना से कमाल अमरोही, महबूब खान पर बहुत नाराज़ हुए थे…

बहरहाल मीना कुमारी और कमाल अमरोही की जिंदगी अच्छी चल रही थी .. लेकिन उसी समय मीनाकुमारी की खुशियों को एक घुन लग गया… उस घुन का नाम था धरम सिंह देओल यानि धर्मेंद्र …उस समय धर्मेंद्र का करियर डांवाडोल चल रहा था , और मीना कुमारी एक वेल स्टेबलिस्ड हिरोइन थी .. कहते हैं कि अपना करियर संवारने के लिए धर्मेंद्र ने मीना कुमारी पर डोरे डालने शुरू कर दिए …उस समय कमाल अमरोही ने पाकीजा फ़िल्म में राजकुमार की जगह धर्मेंद्र को साइन किया था .. लेकिन धर्मेंद्र की नीयत जानकर उन्होने इस फ़िल्म से उन्हे निकाल बाहर किया.. इतना ही नहीं .. कहा ये भी जाता हि कि धर्मेंद्र को नीचा दिखाने के लिए कमाल अमरोही ने उन्हे फ़िल्म रजिया सुल्तान में नौकर का रोल दिया था, जिसका मुंह काला था..

कुल मिलाकर 1964 में मीना कुमारी और कमाल अमरोही का तलाक हो गया.. कहा जाता है कि इस तलाक की बहुत बड़ी वजह थे धर्मेंद्र , जो सिर्फ़ अपन करियर चमकाने के लिए मीना कुमारी से प्यार का ढोंग कर रहे थे… एक तो पति से अलगाव और दूसरे तन्हाई.. इन दोनों से निजात पाने के लिए मीना कुमारी ने शराब का सहारा लेना शुरू कर दिया …मीना कुमारी को एक बार शराब की लत लगी तो फ़िर कभी छूट नहीं पाई .. धीरे धीरे मीना कुमारी पूरी तरह से शराब की गिरफ़्त में आ गईं…शराब उनकी इतनी बड़ी मजबूरी बन गई कि वो शराब बिना नहीं रह सकती है .. शूटिंग के दौरान उन्होने अपने पर्स में शराब की बोतलें रखनी शुरू कर दी, और जब भी मौका मिलता दो घूंट पीकर अपना गला तर कर लेती..अशोक कुमार मीना कुमारी के बहुत अच्छे दोस्त थे….मीना कुमारी से शराब छुड़वाने के लिए दादामुनी ने होम्योपैथ की कुछ दवाईयां मीना कुमारी को लाकर दी…. लेकिन मीना कुमारी ने जो जवाब दिया उसे सुन कर अशोक कुमार कांप गए.. मीना कुमारी अशोक कुमार से कहा कि दवा खाकर भी मैं जियूंगी नहीं , ये जानती हूं मैं.. इसलिए शराब ही पी लेने दो… शराब के कुछ घूंट गले के नीचे उतर जाने दो….

मीना कुमारी इतना शराब पीने लगी कि उनका शरीर खोखला होने लगा…. उनकी खूबसूरती भी खत्म होने लगी.. यहां तक कि उनका लीवर भी डैमेज हो गया…1968 में मीना कुमारी अपना इलाज कराने के लिए लंदन गईं.

और अब जरा पाकीजा बनने की कहानी भी जान लीजिए ….कमाल अमरोही 1958 से फ़िल्म पाकीजा की प्लानिंग कर रहे थे .. लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था…1964 में मीना कुमारी और कमाल अमरोही का तलाक हो गया…मीना कुमारी से अलग होने के बाद कमाल अमरोही ने इस फ़िल्म की प्लानिंग बंद कर दी…..जब कमाल अमरोही ने पाकीजा को बंद किया उस समय फ़िल्म के कुछेक रील शूट हो चुके थे …1969 में सुनील दत्त और नर्गिस , कमाल अमरोही से से मिले और पाकीजा के वो रील दिखाने की गुजारिश की जो शूट किए जा चुके थे…फ़िल्म की कुछ रील्स देखने के बाद सुनील दत्त ने कमाल अमरोही से इस फ़िल्म को दुबारा शुरू करने की रिक्स्वेस्ट की.. कमाल अमरोही राजी भी हो गए, लेकिन बात एक बार फ़िर से मीना कुमारी पर आकर अटक गई…. कमाल अमरोही के कहने पर सुनील दत्त ने मीना कुमारी के साथ उनकी एक मीटिंग कराई…..इस मीटिंग के बाद फ़िल्म पाकीजा फ़िर से शुरू हो गई.. मीटिंग तो सफ़ल हो गई लेकिन इस मीटिंग में मीनाकुमारी के दिल पर दर्द का एक और नश्तर लग गया.. इस मीटिंग के बारे में सुनील दत्त ने बताया था कि

मीटिंग में बात कम हुई, आंसू ज्यादा बहे…. पूरी मीटिंग के दौरान मीना कुमारी रोती रहीं…. कमाल साहब ने उनको सहारा दिया…. और साइनिंग एमाउंट के तौर पर उन्हे सोने का एक सिक्का दिया….इतना ही नहीं कमाल साहब ने ये भी वादा किया कि इस फ़िल्म में वो मीना कुमारी को उतना ही खूबसूरत दिखाएंगे जितनी वो अपनी पहली फ़िल्म में थी

पाकीजा की शूटिंग के दौरान ही मीना कुमारी की तबियत खराब होने लगी…. उनके पैसे भी खत्म होने लगे थे , क्योंकि लंदन जाकर इलाज कराने में उनके अच्छे खासे पैसे खर्च हो चुके थे .. शराब की लत तो उनको थी ही.. लीवर का ऑपरेशन कराने के बाद भी उन्होने शराब पीना नहीं छोड़ा था ….शराब अब उन्हे धीरे धीरे खाती जा रही थी… 4 फ़रवरी 1972 को पाकीजा रिलीज हुई , और इसके आठ हफ़्तों बाद 31 मार्च 1972 को मीना कुमारी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.. फ़िल्म तो हिट हो गई, लेकिन अदाकारा जिंदगी से हार गई…

मीना कुमारी जब मुंबई के सरकारी अस्पताल में अपनी आखिरी सांसे गिन रही थी, उस समय बॉलीवुड का कोई भी इंसान उन्हे देखने तक नहीं गया….मीना कुमारी के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वो अपने इलाज का बिल चुका सकें…. उनकी मौत के बाद उसी अस्पताल के एक डॉक्टर ने मीनाकुमारी का बिल चुकाया जो उनका बहुत बड़े फ़ैन थे….

कोई इतना भी बदकिस्मत हो सकता है इस पर एक बारगी यकीन नहीं होता…. मीना कुमारी जब पैदा हुई तो तब भी अस्पताल का बिल चुकाने के पैसे नहीं थे, और जब भी उनकी मौत हुई, तब भी वो खाली हाथ थी…. और इन दोनो के बीच थी साढ़े उन्तालीस साल की एक कामयाब और चमचमाती जिंदगी … शायर मीना कुमारी के शब्दों को याद करें तो अपना शेर उन्होने शायद अपने लिए ही लिखा था-

टुकड़े टुकड़े दिन बीता, और धज्जी धज्जी रात मिली,

जिसका जितना आंचल था, उतनी ही सौगात मिली

मीना कुमारी बहुत अच्छी शायर भी थी .. जब कमाल अमरोही ने उनको तलाक दिया था तो मीना कुमारी ने एक शेर लिख कर उनको भिजवाया था .. वो शेर था – तलाक तो दे रहे हो नजर-ए-कहर के साथ, मेरी जवानी भी लौटा दो मेहर के साथ

आलोक रत्न उपाध्याय

सीनियर प्रोड्यूसर

सूर्या समाचार

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