SIR पूरी तरह वैध, वोटर लिस्ट अपडेट करना EC का संवैधानिक दायित्व: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को पूरी तरह वैध करार दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि मतदाता सूची अपडेट करना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का हिस्सा है। यह चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है।

कोर्ट ने साफ किया कि SIR कराकर EC ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम नहीं किया है। संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 16 के तहत आयोग को वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण और संशोधन का पूरा अधिकार है। प्रक्रिया सामान्य वेरिफिकेशन से अलग होने के कारण इसे गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता।

दस्तावेज मांगने पर स्थिति स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR के दौरान दस्तावेज मांगने का मतलब यह नहीं है कि लोगों को नागरिक नहीं माना जा रहा है। निष्पक्ष चुनाव का सबसे अहम आधार सही और भरोसेमंद वोटर लिस्ट है। प्रक्रिया में लोगों को जानकारी जोड़ने, सुधार करने और अपील के कई मौके दिए गए।

नागरिकता पर EC का रोल

कोर्ट ने माना कि अगर दस्तावेजों से नागरिकता पर शक हो तो EC नाम हटा सकता है। पूरी प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के दायरे में है। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नागरिकता तय करना EC का काम नहीं है। मतदाता सूची से नागरिकता तय नहीं होती।

SIR के नियम वाजिब

बेंच ने कहा कि SIR के नियम उचित हैं। नोटिस देना, जानकारी सार्वजनिक करना, संदिग्ध मामलों की व्यक्तिगत जांच और अपील का अधिकार मिलना निष्पक्षता की शर्त पूरी करता है। दस्तावेजों की सूची बढ़ाई गई है ताकि ज्यादा लोग शामिल हो सकें।

4 हफ्ते में लिस्ट भेजने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने EC को निर्देश दिया कि ‘संदिग्ध नागरिकता’ के आधार पर हटाए गए नामों की सूची 4 हफ्तों में केंद्र सरकार को भेजे।

कोर्ट ने 29 जनवरी को फैसला सुरक्षित रखा था। SIR प्रक्रिया बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में पूरी हो चुकी है। यूपी, गुजरात और राजस्थान में अभी जारी है।

याचिकाकर्ताओं में ADR, योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा, मनोज झा, केसी वेणुगोपाल और सुप्रिया सुले शामिल थे। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आधार को 12वें दस्तावेज के रूप में मानने को कहा था, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है।

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