नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया में इस समय सबसे बड़ा और शक्तिशाली संगठन बन कर उभरा है। ऐसा भी समय भारत में आया है जब संघ को प्रतिबंधित किया गया और कई बार प्रस्ताव रखा गया कि संघ को प्रतिबंधित किया जाए। संघ कांग्रेस के हमेशा निशाने पर रहा है।
1925 में हुई थी स्थापना
सामान्य जनमानस जो संघ को नहीं जानता है। वह इनके सेवा और अनुशासन को देखकर आश्चर्यचकित रहता है। लोग आपस में चर्चा करते हैं कि पता नहीं संघ कैसे तैयार करता है अपने कार्यकर्ताओं को। जो देश-समाज के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं। 27 सितंबर 1925 में विजय दशमी के दिन महाराष्ट्र के नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। इसके संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार थे, जो पेशे से एक डॉक्टर थे।
1947 में विस्थापितों की मदद की
साल 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तो दुनिया के इतिहास में इतनी बड़ी आबादी का विस्थापन पहली बार लोग देख रहे थे। पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए हजारों से ज्यादा राहत शिविर लगाए। उस समय संघ का कार्य पाकिस्तान के कई हिस्सों में फैला हुआ था। जब दंगा शुरू हुआ तो वहां के हिंदू परिवारों को निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना, उनके लिए भोजन की व्यवस्था करना, बच्चों के लिए दूध की व्यवस्था करना, ये सभी कार्य संघ के कार्यकर्ताओं ने उस समय किए।
कश्मीर के भारत विलय में भी निभाई भूमिका
महाराजा हरिसिंह को समझा-बुझाकर जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय करवाने में संघ का निर्णायक योगदान रहा और जब पाकिस्तानी सेना ने कबायलियों के वेश में जम्मू-कश्मीर पर हमला किया तब स्वयंसेवकों ने राष्ट्र के जागरूक प्रहरी की भूमिका निभाते हुए भारतीय सेना की यथासंभव सहायता की।
युद्धों के समय सेना की मदद की
1962 में जब चीन के साथ युद्ध हुआ, तो सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी। सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवार की देखभाल करना।
1965 के युद्ध में भी निभाई भूमिका
1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में लाल बहादुर शास्त्री को भी संघ याद आया। शास्त्री जी ने कानून व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया। घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाई पट्टी से बर्फ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था।
आपातकाल में भी किया कार्य
1975 से 1977 के बीच आपातकाल के खिलाफ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका आज भी याद की जाती है। आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों को भरने में स्वयंसेवक आगे थे।
उड़ीसा में आए भयंकर चक्रवात में भी की मदद
1971 में उड़ीसा में आए भयंकर चक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों में भी संघ के कार्यकर्ताओं ने राहत-बचाव कार्य में भाग लिया। 1967 में बिहार में भयंकर अकाल पड़ा। जिसमें भारत सरकार की तरफ से जय प्रकाश नारायण को प्रभारी बनाया गया था।
विमान दुर्घटना में भी आया आगे
12 नवंबर 1996 को हरियाणा में चरखी दादरी से 5 किलोमीटर दूर गांव टिकनाकला व सनसनवाल में दो विमान आपस में टकरा गए, जिसमें 349लोगों की मौत हो गई। एक विमान सऊदी अरब से आ रहा था, तो दूसरा विमान सऊदी अरब के लिए उड़ान भरा था। दुर्घटना के बाद मरे हुए लोगों की लाशें 30-35 किलोमीटर में फैल गई थी। संघ के कार्यकर्ताओं ने सभी मृत शरीरों का उनके धार्मिक परंपरा के अनुसार क्रियाकर्म किया।
गुजरात भूकंप
26 जनवरी 2001 को भारत के 51वें गणतंत्र दिवस की सुबह 08:46 बजे गुजरात भूकंप, जिसे भुज भूकंप के नाम से भी जाना जाता है ने तबाही मचाई। यह 2 मिनट से अधिक समय तक चला। इसका केंद्र भारत के गुजरात के कच्छ जिले के भचौ तालुका में चबारी गांव के लगभग 9 किमी दक्षिण-दक्षिणपश्चिम में था। उस समय गुजरात में बहुत ज्यादा जानमाल का नुकसान हुआ उसमें भी संघ के कार्यकर्ताओं ने राहत-बचाव कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाई।
कोरोना में भी आगे आया संघ
कोरोना महामारी में जिनका रोजगार चला गया, उनके रोजगार की व्यवस्था, अस्पतालों में रक्त की व्यवस्था, जो मरीज अवसाद में चले गए, उनके लिए डॉक्टर का सुझाव, स्कूली बच्चों के लिए नि:शुल्क कोचिंग क्लासेज, कोरोना मे लोगों का जन जागरण, जिन घरों में राशन नहीं था उनके घर पर राशन की व्यवस्था, संघ के कार्यकर्ताओं ने की। जब से कोरोना का दूसरा वेरिएंट आया और अस्पताल में ऑक्सीजन व बेड की कमी हुई, संघ ने कार्यकर्ताओं की सहायता से जगह-जगह कोविड केयर सेंटर, हेल्पलाइन सेंटर, प्लाज्मा दान, आयुर्वेदिक काढ़े का वितरण, अंतिम संस्कार करने में भी कार्यकर्ता सेवा दे रहे हैं।
यह लगते रहे हैं आरोप
30 जनवरी, 1948 की शाम दिल्ली के बिड़ला भवन में महात्मा गांधी प्रार्थना स्थल की ओर बढ़ रहे थे। उसी वक्त नाथूराम गोडसे भीड़ से निकला। उसने दोनों हाथ जोड़ रखे थे और हाथों के बीच में रिवॉल्वर छिपा रखी थी। कुछ ही सेकेंड में नाथूराम ने रिवॉल्वर तानी और एक के बाद एक तीन गोलियां गांधीजी पर चला दीं। गांधीजी के मुंह से हे राम… निकला और वे जमीन पर गिर पड़े। नाथूराम को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। वहीं उसके दो साथी नारायण आप्टे और विष्णु करकरे दिल्ली छोड़कर भाग गए।नाथूराम को RSS का सदस्य माना जाता था, इसलिए तत्कालीन केंद्र सरकार ने RSS को गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार मानते हुए उस पर बैन लगा दिया।
4 फरवरी 1948 को किया गया प्रतिबंधित
4 फरवरी 1948 को केंद्र सरकार ने आरएसएस पर बैन लगाने के लिए नोटिस जारी किया। ये गृह मंत्रालय के आर्काइव में मौजूद है। इसमें लिखी कुछ प्रमुख बातें यह थी। सरकार के अनुसार संघ के सदस्यों ने खतरनाक काम किए हैं। देश के कुछ हिस्सों में RSS के सदस्य आगजनी, डकैती, हत्या और अवैध हथियारों के लेन-देन में शामिल रहे हैं। संघ प्रेरित हिंसा ने कई लोगों की जान ली है। राष्ट्रपिता बापू इसके ताजा शिकार बने हैं।