संतोष कुमार सिंह
वैसे तो भारत के भूगोल में लाल आतंक का क्षेत्रफल समय के साथ सिमटता ही जा रहा है लेकिन नक्सल खत्म हो गया है ऐसा दावा विशेषज्ञ भी नहीं करते। हालांकि नक्सलवाद की जड़ो पर मट्ठा डालने का सरकारी प्रयास लगातार जारी है और उन प्रयासो में खाकी वर्दी का अहम रोल हमेशा ही रहा है, इससे शायद ही किसी को इंकार होगा। लाल आतंक को नेस्तनाबूद करने में सुरक्षा एजेसिंयो की अहम भूमिका रही है। खाकी ने चाहे नीतिगत स्तर पर सरकार के नीतियों को जमीन पर उतारने की बात हो या फिर हथियार का जवाब प्रखर तरीके से देकर उनके खतरनाक मंसूबों पर पानी फेरने का तो काम किया ही है साथ ही स्थानीय समुदाय को जमीन पर साथ लेकर न सिर्फ उनका भरोसा जीतने में कामयाबी पाई है बल्कि सरकार के स्तर पर उनके कल्याण के लिए चलाए जा रहे सामाजिक योजनाओं के बेहतर क्रियान्यवयन से खुद को जोड़कर व्यवस्था और आम मानस के बीच पुल के रूप में कार्य करने की अपनी छवी बनाई है।
बड़ी बात ये है कि भले ही आतंक का रंग लाल होता होगा लेकिन जिंदगी का रंग तो सुनहरा ही है और उस सुनहरे पन्ने पर नीली स्याही से कागद कारे करते हुए जब खाकी वर्दी तन पर धारण किये हुए कोई कर्तव्यनिष्ट अधिकारी किताब लिख दे तो वो सिर्फ किताब नहीं रहती बल्कि जिस कालखंड को लेकर वो रचना रची गई है उसके लिए दस्तावेज बन जाती है। और एक ऐसा ही दस्तावेजनुमा उपन्यास है चोला माटी का राम। इस उपन्यास को लिखा है छत्तीसगढ़ पुलिस में डीएसपी अभिषेक सिंह ने।
अभिषेक मूलतः जौनपुर (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले हैं तथा शिक्षा दीक्षा BHU और दिल्ली में हुई है । ये २०१३ बैच के DSP हैं । उत्तर प्रदेश इनकी जन्मभूमि और छत्तीसगढ़ इनकी कर्मभूमि है । जशपुर,गौरेला-पेंड्रा-मरवाही,बिलासपुर और बीजापुर में अपनी सेवाएँ दी हैं । जशपुर में युवकों के बीच ख़ासे चर्चित रहे और अपराध को कंट्रोल करने में इनकी भूमिका के चलते इन्हें सिंघम नाम से जाना गया ।
इनका पहला उपन्यास बैरिकेड बेस्ट सेलर रहा और युवाओं में ख़ासा चर्चित भी । अपने दूसरे उपन्यास चोला माटी के राम में अभिषेक ने लाल आतंक के उस रूप से परिचय करवाया जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।
अभिषेक कहते हैं कि बस्तर एक अघोषित युद्ध क्षेत्र है। यहां हर दिन एक युद्ध है। सेना के पराक्रम के बारे में सभी जानते हैं लेकिन बस्तर के लड़ाके जो आम जनता के लिए वीरगति को प्राप्त होते हैं उनकी कहानी कोई नहीं जानता। वो किस परिस्थिति में वहां युद्ध लड़ रहे,उनके शौर्य के बारे में किंचित मात्र भी लोगों को अंदाज़ा नहीं है ।
अभिषेक ने आगे बताया कि अभी तक बस्तर पर लिखा जाने वाला साहित्य अधिकतर या तो छिछला होता था,सतही होता था या फिर उसके पीछे कोई एजेंडा छुपा होता था । उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभवों पर ये किताब लिखी है। सभी ये जानते हैं कि नक्सली क्या चाहते हैं,पुलिस फ़ोर्स क्या चाहती है लेकिन कोई ये नहीं जानता कि वहाँ का आम आदिवासी क्या चाहता है। उनकी आवाज़ बनने का और बस्तर के जिस रूप को,नकारात्मक छवि को पेश किया गया है उसे सही करने का बीड़ा उठाया है उन्होंने। हर इंसान जो पढ़ सकता है,समझ सकता है,देश प्रेमी है उसे एक बार ज़रूर पढ़नी चाहिए चोला माटी के राम।
अभिषेक कहते हैं कि उन्हें छात्र जीवन से ही लिखने का शौक रहा है। नौकरी की व्यस्तता के बावजूद वे रोजाना लिखने के लिए समय निकालते हैं। इस कार्य के लिए जो उन्होंने समय निर्धारित किया है वो सुबह 5 बजे के बाद का है। उन्होंने इस उपन्यास का 80 फीसदी बीजापुर में लिखा था और बाकी 20 फीसदी बलौंदा बाजार आकर लिखा था। इस तरह से यह उपन्यास मात्र 8 माह में पूरी हो गई। अभिषेक का तीसरा उपन्यास भी 80 फीसदी पूरा हो चुका है।
बुंदेलखंड लिट्रेचर फ़ेस्टिवल में उनकी किताब का विमोचन बड़े पैमाने पर किया गया जहां देश भर के जाने माने साहित्यकार उपस्थित थे। सभी ने उनके साहित्य की और राइफ़ल के साथ कलम के गठजोड़ की भूरी भूरी प्रशंसा की। इस दौरान बुंदेलखंड लिट्रेचर फ़ेस्टिवल के आयोजक प्रताप ने कहा कि पुलिस वालों के पास बहुत क़िस्सागो रहते हैं जिन्हें सुनने के लिए जनता बेताब रहती है। ऐसी धरातल वाली कहानियों को सबके सामने लाया जाना चाहिए और आपने छत्तीसगढ़ का नाम देश में ऊपर किया है उसके लिए आपको बधाईयां।