Places of Worship Act: अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद देश की अदालतों में धार्मिक स्थलों की जांच और एएसआई सर्वे की मांग को लेकर याचिका बढ़ी है। इस समय ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का विवाद कोर्ट में चल रहा है। बीते दिनों भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने ज्ञानवापी परिसर की सर्वे रिपोर्ट को कोर्ट में पेश किया था।
एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में 32 से ज्यादा ज्ञानवापी में मंदिर होने के सबूत पेश किए थे। रिपोर्ट सामने आने के बाद वाराणसी की जिला अदालत ने व्यास तहखाने को पूजा करने के लिए खोलने का आदेश दिया था। इसके बाद मुस्लिम पक्ष लगातार कोर्ट में पूजा स्थल अधिनियम (Places of Worship Act) का हवाला देकर पूजा को रोकने की मांग कर रहा है।
इसको लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि विवादित जगह पर सतह से करीब 100 फीट नीचे आदि विश्वेश्वर का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग है। इस मंदिर का निर्माण 2 हजार साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था, लेकिन मुगल शासक औरंगजेब ने साल 1664 में आकर इसे तोड़कर मस्जिद बनवा दी थी। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण काशी विश्वनाथ मंदिर के अवशेषों से किया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस दावे की जांच करने का काम किया।
क्या कहता है Places of Worship Act ?
बता दें कि, पूजा स्थल अधिनियम कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 के दिन देश में जो भी धार्मिक स्थल और महत्व की इमारतें जिस स्थिति में हैं, उसी स्थिति में रहेंगी। उनका नियंत्रण जिसके पास है, उसी के पास रहेगा। उनके धार्मिक स्वरूप और संरचना में किसी भी तरह का बदलाव नहीं हो सकता। इस कानून में बस धारा 5 के जरिए अय़ोध्या के मामले को अलग रखा गया था, इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट इस पर कोई फैसला कर सका।
इस कानून में कितनी धाराएं और व्यवस्थाएं हैं?
इस कानून में कुल मिलाकर 7 धाराएं हैं। तीसरी धारा स्पष्ट रूप से किसी भी धार्मिक स्थल के मौजूदा स्वरूप में किसी भी संरचनात्मक परिवर्तन पर रोक लगाती है। यह कानून कहता है कि ये अपने पुराने स्वरूप में ही संरक्षित रहेंगे।
धार्मिक स्थलों पर कोई साक्ष्य मिले तो क्या होगा?
अगर धार्मिक स्थलों पर कोई ऐतिहासिक सबूत मिलेगा तब भी कुछ नहीं होगा। इससे साफ पता चलता है कि ऐतिहासिक साक्ष्यों के बावजूद इसके स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। भले ही यह सिद्ध हो जाए कि इसे तोड़कर बनाया गया है। इस दायरे में ताजमहल, कुतुब मीनार जैसी पुरातात्विक इमारतें भी आती हैं, जिनका निर्माण निसंदेह एक धार्मिक वर्ग द्वारा किया गया था लेकिन जहां कोई धार्मिक अनुष्ठान या धार्मिक गतिविधियां नहीं होती हैं। अगर कोई इन धार्मिक स्थलों से छेड़छाड़ करेगा या उन्हें नुकसान पहुंचाएगा तो कानून की धारा 06 के तहत उसे 3 साल की कैद और जुर्माने की सजा दी जाएगी।
मथुरा और ज्ञानवापी में कितनी भूमिका
यह कानून स्पष्ट रूप से उन्हें इसी रूप में बने रहने की इजाजत देगा। इसमें कोई बदलाव नहीं करेंगे। यानी ज्ञानवापी और मथुरा जैसे मामलों में धार्मिक स्थलों के मौजूदा स्वरूप और संरचना में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है। अगर केंद्र सरकार चाहे तो इस कानून में संशोधन कर सकती है, लेकिन इसके लिए उसे संसद में प्रस्ताव पारित कर इसे कानून का रूप देना होगा।
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