नई दिल्लीःबिहार में जाति आधारित सर्वेक्षण जारी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है। सोमवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार के जाति-आधारित सर्वेक्षण को बरकरार रखने के पटना हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल याचिका की सुनवाई स्थगित कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दाखिल करने वाले एक गैर सरकारी संगठन के उस तर्क को खारिज कर दिया कि जाति के आधार पर डाटा एकत्र करने की कोशिश जनगणना के समान है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति संजय खन्ना और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ याचिका पर सुनवाई करने वाली थी, लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने शीर्ष अदालत के उसी फैसले को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका आज सूचीबद्ध नहीं होने के कारण स्थगन की मांग की। वहीं, सुनवाई स्थगित करने से पहले एक अन्य वकील ने पीठ से यथास्थिति आदेश देने का अनुरोध किया। न्यायाधीश संजय खन्ना ने कहा कि यथास्थिति का कोई प्रश्न नहीं? हमने नोटिस भी जारी नहीं किया है। निर्णय के अनुसार, 80प्रतिशत सर्वेक्षण पूरा हो चुका है।
पटना हाई कोर्ट ने उच्च हाई कोर्ट ने बिहार सरकार द्वारा कराए जा रहे जाति सर्वेक्षण को 1 अगस्त को वैध और कानूनी ठहराया था। साथ ही उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था जो जून 2022 में राज्य सरकार द्वारा शुरू किए गए जाति सर्वेक्षण के खिलाफ दायर की गई थीं। पटना हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में दलील दी गई है कि राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है। नालंदा निवासी अखिलेश कुमार द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, केवल केंद्र सरकार को जनगणना करने का अधिकार है। इसमें कहा गया है कि इस मामले में बिहार सरकार ने केवल आधिकारिक राजपत्र में एक अधिसूचना प्रकाशित कर केंद्र सरकार के अधिकारों का हनन किया है।