टूट रहा था बांध…DM साहब ने खुद लाद लिया पीठ पर बोरा

बिहार में लगातार हो रही बारिश से बाढ़ ने तबाही मचा रखी है.खासकर नेपाल से आने वाले पानी ने सीमावर्ती जिलों में प्रलय की स्थिति पैदा कर दी है. राज्य के10 जिले इस बाढ़ के चपेट में है. कोसी नदी की सीधे चपेट में होने के वजह से मोतिहारी, सीतामढ़ी, सुपौल, मधुबनी, किशनगंज, सहरसा, भागलपुर, अररिया, पूर्णिया और कटिहार में स्थिति लगातार खराब होते जा रही है. नेपाल से छोड़ा हुआ पानी कोसी और गंडक नदी में मिलकर तबाही को बढ़ाते जा रहा है.

राज्य में इस बाढ़ की चपेट में आने से करीब 20 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, वहीं लाखों लोगों को घर छोड़ना पड़ा है. लेकिन इस प्रलयकारी स्थिति में एक राहत भरी तस्वीर सामने आई है. ये तस्वीर बिहार के पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) के डीएम रमण कुमार की है. दरअसल, 12 जुलाई को डीएम रमण कुमार बाढ़ का जायजा लेने जिले के खोड़ीपाकड़ में लालबकेया नदी के बने बांध पर पहुंचे. निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी तटबंध पर हुए रेनकट को जैसे ही देखा तो वहां खड़े मजदूरों से कुदाल ले लीऔर बोरी में बालू भरकर रेनकट वाले स्थान को भरने लगे. डीएम साहब को ऐसा करते हुए देखकर और भी अधिकारी पीठ पर बालू के बोरे लादकर घाट पर लेकर जाने लगे. रेनकट का तमाशा देख रहे अन्य लोग भी मरम्मत काम में जिलाधिकारी के संग लग गए और देखते-देखते कुछ ही देर में तात्कालिक तौर पर बांध को ठीक कर लिया गया. हालांकि, जिलाधिकारी ने मौके पर तैनात विभागीय अभियंता व प्रशासनिक अधिकारियों को हिदायत भी दी कि किसी भी स्थिति में तटबंध टूटने नहीं चाहिए.

नदी के किनारे बालू भरे बोरे जमा करने पर पानी की तेज धार मिट्टी का कटाव नहीं करती है. इससे बाढ़ का खतरा कुछ हद तक टल जाता है. डीएम रमण सिंह ने दिनभर की मेहनत के बाद शाम में भी आराम मुनासिब नहीं समझा. देर शाम वों जिले के ढाका प्रखंड के सराठा गांव में एनडीआरएफ की टीम के साथ पहुंचे. टीम के अधिकारियों से तत्काल ग्रामीणों के समक्ष राहत व बचाव कार्य करने की कवायद तेज की. देर रात तक वे फिल्ड में ही जमे रहे.

पूर्वी चंपारण के डीएम रमण कुमार कहते हैं कि आम आदमी की जिंदगी की रक्षा सबसे अहम है. आम लोग वहां बांध को लेकर चिंतित थे और काम कर रहे थे. मैंने भी श्रमदान किया. यह मेरा नैतिक दायित्व था. ऐसा सभी को करना चाहिए. प्रशासनिक अधिकारियों को आपात स्थिति में अपने पद की ठसक से बाहर निकलकर आम आदमी के साथ कदमताल करना चाहिए. ऐसा करने से बड़ी से बड़ी आपदा को आदमी टाल सकता है. मैंने जो किया वह एक आदमी के तौर पर मेरा दायित्व है.

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