वाराणसी: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने राजघाट स्थल से उत्खनन में प्राप्त मानव कंकाल पर पहली बार अंतःविषय आनुवंशिक और जैव-पुरातात्विक अध्ययन शुरू किया है। यह अध्ययन गंगा घाटी के प्राचीन निवासियों की वंशावली, आहार, स्वास्थ्य और जीवनशैली के रहस्यों को उजागर करने के साथ-साथ सिंधु घाटी सभ्यता, विशेषकर राखीगढ़ी के लोगों से उनके संभावित आनुवंशिक संबंधों की जांच करेगा।
यह कंकाल 1957-58 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और बीएचयू द्वारा राजघाट में किए गए उत्खनन के दौरान मिला था। राजघाट वाराणसी के उत्तर-पूर्वी छोर पर गंगा और वरुणा नदियों के संगम के पास स्थित प्रमुख पुरातात्विक स्थल है। तब से यह कंकाल विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में सुरक्षित रखा गया था। लगभग 69 वर्षों बाद मंगलवार को इस कंकाल से नमूने एकत्र किए गए।
अध्यन से क्या होगा?
अध्ययन पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष प्रो. एम.पी. अहिरवार की पहल पर जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे और प्राचीन डीएनए विशेषज्ञ डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह के नेतृत्व में हो रहा है। वैज्ञानिक रेडियोकार्बन डेटिंग से कंकाल की सटीक आयु निर्धारित करेंगे। अनुमान के अनुसार यह लगभग एक हजार से ढाई-तीन हजार वर्ष पुराना हो सकता है। माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए विश्लेषण से मातृ वंश और वाई-क्रोमोसोम अध्ययन से पितृ वंश का पता चलेगा। स्थिर आइसोटोप विश्लेषण से उस काल के लोगों के आहार-शाकाहारी या मांसाहारी और जीवनशैली की जानकारी मिलेगी।
गंगा घाटी की प्राचीन आबादी को समझने का दुर्लभ अवसर
प्रो. चौबे ने कहा कि यह अध्ययन गंगा घाटी की प्राचीन आबादी की आनुवंशिक विविधता को समझने का दुर्लभ अवसर है। राखीगढ़ी के हड़प्पा कालीन कंकालों से तुलना करके सिंधु घाटी और गंगा घाटी की आबादियों के बीच संबंधों पर नई रोशनी पड़ सकती है। बीएचयू कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने इसे पुरातत्व, इतिहास और आनुवंशिकी के बीच महत्वपूर्ण सेतु बताया है।
यह शोध प्राचीन काशी की सभ्यता, प्रवास पैटर्न और सांस्कृतिक निरंतरता को वैज्ञानिक आधार पर समझने में मदद करेगा। परिणाम आने पर गंगा घाटी की मानवीय इतिहास पर नई जानकारी सामने आने की उम्मीद है।