Supreme Court on Madrasa Act: उत्तर प्रदेश के मदरसों में पढ़ने वाले 16 लाख से ज्यादा छात्रों को बड़ी राहत मिली है। आज सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें उत्तर प्रदेश मदरसा एक्ट 2004 को असंवैधानिक बताया था। कोर्ट ने इसी के साथ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 22 मार्च के फैसले को भी खारिज कर दिया, जिसमें यूपी मदरसा अधिनियम को रद्द किया गया था।
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से प्रदेश के 16 हजार मदरसों को राहत मिल गई है। यानी अब यूपी में मदरसे चलते रहेंगे और मदरसों की कुल संख्या लगभग 23,500 है। इन मदरसों में से 16,513 मदरसे मान्यता प्राप्त हैं। यानी ये सभी पंजीकृत हैं। इसके अलावा करीब 8,000 मदरसे गैर मान्यता प्राप्त हैं। मान्यता प्राप्त मदरसों में 560 ऐसे हैं, जो एडेड हैं। यानी 560 मदरसों का संचालन सरकारी पैसों से होता है।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 22 अक्टूबर को सुनवाई पूरी करते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया था। हालांकि, सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि फाजिल और कामिल के तहत डिग्री देना राज्य के दायरे में नहीं है। यह यूजीसी अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है।
चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच के फैसले के बाद राज्य के मदरसों को मान्यता मिलने और उनके संचालन में स्थायित्व आने की संभावना है। अदालत ने माना कि एक्ट के प्रावधान संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हैं और ये धार्मिक अल्पसंख्यकों के शैक्षिक अधिकारों की सुरक्षा करते हैं।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि सरकार मदरसा शिक्षा को लेकर नियम बना सकती है। किसी छात्र को धार्मिक शिक्षा के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि मदरसा बोर्ड फाजिल, कामिल जैसी उच्च डिग्री नहीं दे सकता, जो यूजीसी अधिनियम के विपरीत है। इसे असंवैधानित माना जाएगा।
क्या है मदरसा एक्ट?
बता दें कि, यूपी मदरसा एक्ट को साल 2004 में बनाया गया था। इसके तहत ही मदरसा बोर्ड का गठन किया गया था। इसका मुख्य मकसद मदरसा में होने वाली शिक्षा की व्यवस्था को ठीक करना था। यूपी में कुल 25 हजार मदरसे हैं, जिनमें से लगभग 16 हजार को यूपी बोर्ड ऑफ मदरसा से मान्यता मिली है तो वहीं 8 हजार के करीब मदरसों को बोर्ड ने मान्यता नहीं दी है।
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