जनसंघ के समय से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है समान नागरिक संहिता

नई दिल्लीः समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिए हालिया बयान के बाद देश में एक बार फिर इसको लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसके पक्ष में दलीलें दे रहे हैं, तो कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं। भोपाल में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने देश में समान नागरिक संहिता की वकालत करते हुए कहा था कि इसपर विपक्षी दल लोगों को भड़का रहे हैं। एक ही घर में दो कानून कैसे हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट भी बार-बार कह चुका है कि समान नागरिक संहितालाओ, लेकिन विपक्षी दल वोट बैंक के लिए इसका विरोध कर रहे हैं।

समान नागरिक संहिताका जिक्र भारतीय संविधान में भी किया गया है। समान नागरिक संहिता का अर्थ है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना। चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। शादी, तलाक, गोद लेने और जमीन-जायदाद से संबंधित बंटवारे में सभी धर्म के लोगों के लिए एक ही कानून लागू होगा। दरअसल, संविधान निर्माताओं ने नीति निर्देशक सिद्धांत में आर्टिकल-44के माध्यम से समान नागरिक संहिता को लेकर विचार व्यक्त किए थे, ताकि सभी धर्म और संप्रदाय के लोगों के लिए एक जैसा पर्सनल लॉ हो।

कानून के जानकारों का कहना है कि समान नागरिक संहिता पर जब संविधान सभा में बहस चल रही थी, तब संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन डॉ. भीम राव अंबेडकर ने कहा था कि देश में सिविल लॉ है, जिसके प्रावधान समान रूप से देश पर लागू हैं, लेकिन शादी के साथ-साथ उत्तराधिकार आदि के कानून एक समान रूप से लागू नहीं हैं। हम इस पर एक समान कानून नहीं बना पाए हैं। इसलिए हम चाहते हैं कि इस मामले में सकारात्मक बदलाव हो। समान नागरिक संहिता एक ऐसा विषय है जो कई दशकों से भारतीय राजनीति में बहस का केंद्र रहा है। समान नागरिक संहितासत्ताधारी भाजपा के लिए जनसंघ के जमाने से प्राथमिकता वाला एजेंडा रहा है। साल 1967के आम चुनाव में भारतीय जनसंघ ने अपने चुनावी घोषणापत्र में पहली बार समान नागरिक संहिता का उल्लेख किया था। यह मुद्दा भाजपा के 2019के लोकसभा चुनाव घोषणापत्र का भी हिस्सा था।

समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद हिंदू कोड बिल, शरीयत कानून, विशेष विवाह अधिनियम जैसे कानूनों की जगह लेगा। समान नागरिक कानून तब सभी नागरिकों पर लागू होगा चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। इसके समर्थकों का तर्क है कि यह लैंगिक समानता को बढ़ावा देने, धर्म के आधार पर भेदभाव को कम करने और कानूनी प्रणाली को सरल बनाने में मदद करेगा। वहीं, दूसरी ओर इसको लेकर विरोध कर रहे लोगों का तर्क है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करेगा। व्यक्तिगत कानूनों को प्रत्येक धार्मिक समुदाय के विवेक पर छोड़ देना चाहिए।

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