पटना: पूर्व सांसद आनंद मोहन की बेटी सुरभि आनंद की कल यानी 15फरवरी को मुंगेर के रहने वाले राजहंस सिंह के साथ शादी होने जा रही है। बीते सोमवार को मेहंदी की रस्म पूरी की गई और आज हल्दी सेरेमनी का आयोजन किया गया है। वहीं आजीवन कारावास की सजा पूरी कर रिहाई की बाट जोह रहे पूर्व सांसद आनंद मोहन अपनी बेटी की शादी में शामिल होने के लिए दूसरी बार 15दिन के पैरोल पर बाहर आए हुए हैं, हालांकि इससे पहले भी वे अपनी बेटी की सगाई पर पैरोल पर बाहर आए हुए थे।
जेपी आंदोलन में छात्र के रूप में शामिल रहे आनंद मोहन की छवी बाहुबली राजपूत नेता की रही है। वैसे तो बिहार के बाहुबली नेताओं का जब नाम आता है तो जेहन में जो चेहरे उभरते हैं उनमें सूरजभान सिंह, अनंत सिंह, सुनील पांडेय और रामा सिंह जैसे बाहुबलियों की लंबी फेहरिश्त रही है। इन्हीं बाहुबलियों के बीच एक नाम है पूर्व सांसद आनंद मोहन का। वे अभी गोपालगंज के डीएम रहे जी कृष्णैया के हत्याकांड मामले आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। हालांकि आनंद मोहन पर आरोप है इस हत्याकांड में शामिल भीड़ उन्हीं के उकसावे पर जमा हुई थी जिसके परिणाम स्वरूप डीएम की हत्या हो गई। वो आजाद भारत के पहले ऐसे राजनेता हैं, जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी लेकिन बाद में उसे उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया।
मीटिंग कर लौट रहे डीएम पर हुआ था हमला
दरअसल, डीएम की हत्या के एक दिन पहले (4दिसंबर 1994) मुजफ्फरपुर में आनंद मोहन की पार्टी (बिहार पीपुल्स पार्टी) के नेता रहे छोटन शुक्ला की हत्या हुई थी। इस भीड़ में शामिल लोग छोटन शुक्ला के शव के साथ प्रदर्शन कर रहे थे। तभी मुजफ्फरपुर के रास्ते हाजीपुर में मीटिंग कर गोपालगंज जा रहे डीएम जी. कृष्णैया पर भीड़ ने खबड़ा गांव के पास हमला कर दिया। मॉब लिंचिंग और पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बीच डीएम को गोली मार दी गई। तब कृष्णैया मात्र 35साल के थे। इसी मामले में पूर्व सांसद आनंद मोहन को सजा हुई थी।
वैसे तो आनंद मोहन सिंह पर कई मामलों में आरोप लगे। अधिकतर मामले या तो हटा दिए गए या वो बरी हो गए। लेकिन 1994में एक मामला ऐसा आया, जिसने न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश को हिलाकर रख दिया। इस मामले में पूर्व सांसद को पहले फांसी की सजा हुई और जिसे बाद में उम्र कैद में तब्दील कर दिया गया। इस लिहाज से आनंद मोहन 15वर्ष से ज्यादा का समय जेल में व्यतीत कर चुके हैं।
आनंद मोहन, उनकी पत्नी समेत 6 को बनाया गया था आरोपी
इस मामले में आनंद, उनकी पत्नी लवली समेत 6 लोगों को आरोपी बनाया गया था। साल 2007 में पटना हाईकोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया और फांसी की सजा सुनाई जो कि किसी राजनेता को मौत की सजा देने का आजाद भारत में यह पहला मामला था। हालांकि 2008 में इस सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया। साल 2012 में सिंह ने सुप्रीम कोर्ट से सजा कम करने की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।
कोसी के गांधी कहे जाने वाले रामबहादुर सिंह के परिवार से रहा है नाता
आनंद मोहन एक महान स्वतंत्रता सेनानी रामबहादुर सिंह के परिवार से है। उनके दादा रामबहादुर को कोसी का गांधी कहा जाता है जो कि एक स्वतंत्रता सेनानी थे। इनके परिवार के कई लोगो ने आजादी के लड़ाई में भाग लिया। उन्होंने आपातकाल के दौरान जे.पी. आन्दोलन में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। भगत सिंह और नेल्सन मंडेला आनंद मोहन के आदर्श हैं। कोसी की मिट्टी पर पैदा लिए आनंद मोहन क्रांति के अग्रदूत और संघर्ष के पर्याय हैं। सत्ता के मुखर विरोध के कारण उन्होंने अपनी जवानी का अधिकांश हिस्सा जेल में बिताया है।
कवि के रूप में आनंद मोहन
पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने आनंद मोहन के कविता संग्रह कैद में आजाद कलम का दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशनल क्लब में लोकार्पण किया। यह कार्यक्रम फ्रेंड्स ऑफ आनंद मोहन की ओर से आयोजित किया गया था। कविता संग्रह राजकमल प्रकाशन में छपकर तैयार है। कविता संग्रह की कविताएं जेल में लिखी गई हैं। 1974 के आंदोलन के समय वे क्रांतिदूत अखवार के संपादक थे। कोसी इलाके का यह चर्चित अखवार था। बिहार का तीसरा जलियावाला बाग कांड के नाम से उनकी एक स्टोरी काफी चर्चित हुई थी। सहरसा जेल में रहकर आनंद मोहन आज गांधी और बौद्ध दर्शन का ब्यापक अध्ययन कर चार खंडों में अपनी जेल डायरी को सहेजने में भी लगे हुए हैं। वे अपनी आत्मकथा बचपन से पचपन तक भी लिख रहे हैं। उनकी कुछ प्रकाशित रचनाएँ हैं:
कैद में आजाद कलम
काल कोठरी से (प्रकाशनाधीन)
कहानी संग्रह तेरी मेरी कहानी