लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां जोरों पर है ऐसे में सभी पार्टियां अपने प्रचार-प्रसार में जोर-शोर से लगे हुए हैं. हालांकि, चुनाव की तारीख की अभी घोषणा होनी बाकी है. जैसे ही चुनाव की घोषणा होगी, आचार संहिता भी लागू हो जायेगी. लेकिन इससे पहले आज-कल सरकारों के लोकार्पण, शिलान्यास और सरकारी योजनाओं से जुड़े विज्ञापनों से दैनिक अखबार भरे पड़े हैं.
ऐसे में आम जनता से जूड़ी सारी समस्याओं की ख़बरें कहीं दब सी गई है. यूं तो इन विज्ञापनों का उद्देश्य भी सरकारी योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाना होता है, लेकिन जानकारों का यह भी कहना है कि इन योजनाओं की प्रचार-प्रसार की आड़ में राजैनिक पार्टियां अपनी ब्रांडींग पर ज्यादा फोकस कर रही है.
आंकड़े भी कुछ ऐसे ही इशारे दे रहे है. मतलब कि आप कह सकते हैं कि जितना का बाबू ना उतना का झूनझूना. अब इन आंकड़ो पर ज़रा गौर फरमाइये. अब ये आंकड़े भी कोई नहीं बल्कि केंद्रीय सूचना व प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन राठौर ने दिये थे.
लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था कि केन्द्र सरकार ने 2014 से 7 दिसम्बर 2108 तक सरकारी योजनाओं की प्रचार-प्रसार में कुल 5245.73 करोड़ रुपये की धन राशी खर्च की गई. जबकि मोदी सरकार की तुलना में यूपीए सरकार के दस साल में कुल मिलाकर 5,040 करोड़ रुपये विज्ञापन पर खर्च हुए.
हालांकि, अभी मोदी सरकार ने अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं किया है. और इलेक्शन के प्रचार-प्रसार का खर्च अभी कुछ साफ नहीं है.