नई दिल्लीः मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर मंगलवार यानी 8अगस्त से चर्चा शुरू होगी। मिली जानकारी के अनुसार, चर्चा के आखिरी दिन 10अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जवाब दे सकते हैं। इसके बाद 11अगस्त को मानसून सत्र खत्म हो जाएगा। विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को लेकर मोदी सरकार चिंतित नहीं है,क्योंकि सदन में संख्या बल के हिसाब से विपक्ष के मुकाबले सरकार ज्यादा मजबूत है। इस कारण इस प्रस्ताव का गिरना तय है, लेकिन माना जा रहा है कि तीन दिन तक अविश्वास प्रस्ताव पर चलने वाली चर्चा बहुत तीखी हो सकती है और विपक्ष का हमलावर रूख सरकार को असहज भी कर सकता है। मणिपुर में जारी हिंसा को लेकर एक तरफ विपक्ष संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में आक्रामक रुख अख्तियार किए हुए है, वहीं सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में काफी गंभीर नजर आ रहा है।
मानसून सत्र के पहले दिन से ही आक्रामक है विपक्ष
मानसून सत्र के पहले दिन से ही विपक्षी दल मणिपुर में जारी हिंसा पर विस्तृत चर्चा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान की मांग कर रहे हैं। इस मुद्दे पर पीएम मोदी सदन में आकर बोलें, इसके लिए कांग्रेस ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव भी पेश किया है, जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने स्वीकार कर लिया था। इस बीच 16विपक्षी दलों के करीब 20सांसदों ने मणिपुर का दौरा कर वहां के जमीनी हालात की जानकारी भी ली है,जिसे वो सदन व राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।
तेज हो गई है विपक्ष और सरकार की तैयारी
अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा को लेकर विपक्ष दलों और सरकार ने अपनी तैयारी तेज कर दी है। चर्चा की शुरुआत लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश करने वाले कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई करेंगे। चूंकि गौरव गोगोई उत्तर पूर्व से हैं ऐसे में भाजपा की ओर से भी उत्तर पूर्व के दो से ज्यादा सदस्य इसमें हिस्सा ले सकते हैं। मोदी सरकार की कोशिश होगी कि उत्तर पूर्व के सदस्य ही कांग्रेस काल में क्षेत्र की अनदेखी का आरोप लगाएं और इस मुद्दे पर कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों को बैकफुट पर ला दें।
विपक्ष को खामोश करने के लिए अमित शाह क्या करेंगे खुलासा
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मणिपुर पर विपक्ष के आरोपों की काट करेंगे। साथ ही मणिपुर में अब तक हुए चार बड़े दंगों के दौरान कांग्रेस की प्रतिक्रिया क्या रही है इसका भी खुलासा करेंगे। चर्चा के दौरान प्रत्येक दल के नेता को बोलने का समय दिया जाएगा।
…जब मोदी ने कहा था अविश्वास प्रस्ताव लाने का कांग्रेस को फिर अवसर मिलेगा
आपको बता दें कि वर्ष 2018में विपक्ष की ओर से मोदी सरकार के खिलाफ जब पहला अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था तो इस पर जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुटकी लेते हुए कहा था कि कांग्रेस को 2023में अविश्वास प्रस्ताव लाने का फिर से अवसर मिलेगा।
लोकसभा में किसके पास कितनी ताकत
विपक्ष और सत्ता पक्ष के खेमें में आंकड़ों की बात करें तो 543सदस्यों की लोकसभा में अभी पांच सीटें खाली हैं। इनमें दो सीटें राहुल गांधी और अफजाल अंसारी को अयोग्य घोषित करने से खाली हुई हैं, जबकि तीन सीटें वहां के सांसदों की अचानक हुई मौत की वजह से खाली हैं। लोकसभा में सदस्यों की मौजूदा संख्या 538है और बहुमत का आंकड़ा 270है। भाजपा के पास लोकसभा अध्यक्ष को मिलाकर कुल 301सांसद हैं, जो बहुमत के आकंड़े से कहीं ज़्यादा हैं। वहीं, सहयोगी दलों को मिला दिया जाए तो यह आंकड़ा 331पहुंच जाता है, जबकि विपक्षी घेमें के पास सांसदों की संख्या करीब 145है। संख्या बल के हिसाब से लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव गिरना तय माना जा रहा है।
ये दल किसी के साथ नहीं
लोकसभा में कई ऐसे दल हैं जो न तो भाजपा के साथ हैं और न ही कांग्रेस के साथ हैं। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजू जनता दल(बीजद), आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाईएसआर कांग्रेस पार्टी, मायावती की बहुजन समाज पार्टी और चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी(टीडीपी) जैसे कुछ दल अभी भी किसी खेमे में नहीं हैं। ऐसे में यह देखना बेहद रोचक होगा कि ये दल अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान विपक्ष की तरफ से बोलते हैं या सदन में अनुपस्थित रहकर अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का साथ देते हैं।
लोकसभा में कई ऐसे दल हैं जो न तो भाजपा के साथ हैं और न ही कांग्रेस के साथ हैं। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजू जनता दल(बीजद), आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाईएसआर कांग्रेस पार्टी, मायावती की बहुजन समाज पार्टी और चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी(टीडीपी) जैसे कुछ दल अभी भी किसी खेमे में नहीं हैं। ऐसे में यह देखना बेहद रोचक होगा कि ये दल अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान विपक्ष की तरफ से बोलते हैं या सदन में अनुपस्थित रहकर अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का साथ देते हैं।