मैनपुरी उपचुनाव.. किसी के लिए गढ़ को बचाने तो किसी के लिए परिवार से मुक्ति दिलाने की है लड़ाई

समाजवादी पार्टी और परिवार के मुखिया मुलायम सिंह यादव के देहांत के बाद खाली हुई मैनपुरी संसदीय सीट पर चुनाव का बिगुल बज चुका है। समाजवादी पार्टी ने इस सीट पर ​परिवार की बहू डिंपल यादव को उम्मीदवार बनाया है तो वहीं भाजपा ने पूर्व सांसद और मुलायम सिंह के करीबी रहे और पूर्व सपाई रघुराज शाक्य पर दाव लगाया है।

जीत किसकी होगी ये तो 8 दिसंबर को चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चल पायेगा लेकिन दोनो ही खेमा मैनपुरी का चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ है और चाहे सपा हो या भाजपा हर कीमत पर जीत हासिल करना चाहती है। इसके लिए ​हर तरह के दावपेंच, आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है, कहीं फुटबॉल उछाला जा रहा है तो कहीं पेंडुलम की चर्चा है। इस बीच सपा द्वारा भाजपा पर सीबीआई और ईडी के दुरूपयोग के भी आरोप लगाये जा रहे हैं।

पूरे कुनबे के साथ जुटे हुए हैं अखिलेश

अखिलेश यादव अपने पूरे कुनबे के साथ मैनपुरी में चुनाव प्रचार कर रहे हैं और ऐन चुनाव के मौके पर चाचा अखिलेश यादव के साथ आ जाने मुश्किल लग रही मैनपुरी की लड़ाई को आसान माना और बताया जा रहा है। खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मैनपुरी में जनसभा कर चुके हैं और भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बना रहे हैं।

भाजपा ने क्यों बनाया रघुराज शाक्य को उम्मीदवार

रघुराज शाक्य 2012 में इटावा सदर सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े और जीत हासिल की थी, लेकिन 2017 के आम चुनावों में रघुराज का टिकट काट दिया गया, जिसके बाद खुद शाक्य और उनके सैकड़ों समर्थको ने सपा से इस्तीफा दे दिया था। सपा छोड़ने के बाद रघुराज सिंह शाक्य शिवपाल सिंह यादव की पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष बन गए। रघुराज सिंह शाक्य 1999 और 2004 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लगातार दो दफा सांसद चुने गए। इस बार लोकसभा उप-चुनाव पर शाक्य भाजपा की और से जीत का हुंकार भर रहे हैं और जानकारी के अनुसार मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र में शाक्य समाज के वोटरों की संख्या 1 लाख 60 हजार है जो की भाजपा को फायदा पहुंचा सकती है।

क्या है मैनपुरी सीट का इतिहास

मैनपुरी सीट पर पहला चुनाव 1952 में हुआ था उस समय इस सीट के पहले सांसद के रूप में बादशाह गुप्ता जीत हासिल की थी। इसके बाद 1957 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के बंशी दास धनगर ने बादशाह गुप्ता को हराया। 1962 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बादशाह गुप्ता दूसरी बार सांसद बने। इसके बाद कांग्रेस के टिकट पर 1967 और 1971 में महाराज सिंह सांसद चुने गए। 1977 में हुए चुनाव में भारतीय लोकदल के रघुनाथ सिंह वर्मा ने कांग्रेस के महाराज सिंह को हराया। 1980 में रघुनाथ सिंह वर्मा जनता पार्टी के टिकट पर जीते। 1984 के चुनाव में कांग्रेस के बलराम सिंह यादव सांसद चुने गए। समाजवादी नेता और कवि उदय प्रताप सिंह 1989, 1991 में जनता पार्टी के टिकट पर सांसद चुने गए।

पार्टी का गढ़ रहा है मैनपुरी

मुलायम सिंह यादव ने 1992 में समाजवादी पार्टी बनाई। साल 1996 के लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी से चुनाव लड़े और जीते। 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में सपा के बलराम सिंह यादव सांसद चुने गए। 2004 के लोकसभा चुनाव में फिर सपा के मुलायम सिंह यादव जीते लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

2004 में कराए गए उप-चुनाव में उनके भतीजे धर्मेंद्र यादव मैनपुरी से सांसद चुने गए। 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव में फिर मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से सपा के टिकट पर सांसद बनें। 2014 में मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ और मैनपुरी दोनों जगहों से जीते थे। बाद में उन्होंने मैनपुरी लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया। 2014 में हुए उपचुनाव में मुलायम सिंह यादव के परिवार के तेज प्रताप यादव सपा के टिकट पर सांसद चुने गए।

मैनपुरी का जातिगत समीकरण

मैनपुरी लोकसभा सीट में सबसे ज्यादा यादव मतदाता हैं। जिनकी संख्या करीब 3.5 लाख है। करीब 1 लाख 50 हजार ठाकुर मतदाता हैं। ब्राह्मण 1 लाख 20 हजार, शाक्य एक लाख 60 हजार, जाटव एक लाख 40 हजार और एक लाख लोधी राजपूत मतदाता हैं। वैश्य और मुस्लिम मतदाता भी एक लाख के करीब हैं। कुर्मी मतदाता भी एक लाख से ज्यादा हैं।

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