स्वच्छता के प्रति डॉ पाठक का जुनून हमेशा दिखता रहा: प्रधानमंत्री

संतोष कुमार सिंह

नयी दिल्ली: आजादी के मौके पर जब देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा था तो सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक का मंगलवार (15अगस्त) को निधन होने की खबर आई। डॉ पाठक अपने संस्थान सुलभ इंटरनेशनल के पालम स्थित कार्यालय में झंडोत्तोलन कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे। उसी कार्यक्रम के दौरान डॉ पाठक की तबियत खराब हो गई और उन्हें दिल्ली के एम्स लाया गया जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया था। डॉक्टरों ने उन्हें कार्डियक पल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) की मदद से सांस देने की भी कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। डॉ पाठक 80वर्ष के थे।

सामाजिक संगठन सुलभ इंटरनेशनल के प्रणेता डॉ पाठक का जन्म बिहार के वैशाली जिले के रामपुर बाघेल गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी मां योगमाया देवी थीं और उनके पिता रमाकांत पाठक थे। 80साल के डॉ. बिंदेश्वर पाठक पद्म विभूषण से सम्मानित हो चुके थे। पिछले हफ्ते वे अपने गृह क्षेत्र बिहार आए थे और यहां साहित्य के कार्यक्रमों में शामिल भी हुए थे। सुलभ इंटरनेशल के जरिए उन्होंने शौचालय क्रांति तो लाई ही साथ ही शिक्षा के माध्यम से मानव अधिकारों, पर्यावरण स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन और सुधारों को बढ़ावा देने की दिशा में जीवन पर्यंत काम किया। उन्होंने मानव मल का ऊर्जा के रूप में उपयोग और सुलभ शौचालय से देशभर में स्वच्छता की मुहिम शुरू की थी।

पीएम मोदी ने जताया दुख

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा, डॉ. बिंदेश्वर पाठक जी का निधन हमारे देश के लिए एक गहरी क्षति है। वह एक दूरदर्शी व्यक्ति थे, जिन्होंने सामाजिक प्रगति और वंचितों को सशक्त बनाने के लिए बड़े पैमाने पर काम किया।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि, बिंदेश्वर जी ने स्वच्छ भारत के निर्माण को अपना मिशन बना लिया था. उन्होंने स्वच्छ भारत मिशन को जबरदस्त समर्थन प्रदान किया। हमारी विभिन्न बातचीत के दौरान स्वच्छता के प्रति उनका जुनून हमेशा दिखता रहा।

देहावसान के ठीक पहले आये थे बिहार

अपने देहावसान से चार दिन पहले यानी 11 अगस्त की शाम को डॉ पाठक पटना आये थे और पटना के कालिदास रंगालय में पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में शामिल हुए थे। वे सुविख्यात लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित पुस्तक पिया गइले कलकतवा के लोकार्पण समारोह में शामिल हुए थे। बिहार में यह उनका अंतिम कार्यक्रम साबित हुआ। यहां डॉ. पाठक ने कहा- भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी लोक कला और साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की। वह जनमानस के कलाकार थे। उनके कार्य से प्रभावित होकर ही राहुल सांस्कृत्यायन ने उन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर कहा था। किरणकांत वर्मा ने उनपर इस तरह की किताब लिखकर सराहनीय काम किया है। आने वाली पीढ़ी यह किताब पढ़ कर भोजपुरी लोक कला पर भिखारी ठाकुर के कार्यों को सही मायने में समझ सकेगी। उन्हें अपनी लोक-संस्कृति और लोक भाषा को जानने में सहूलियत होगी और वह अपनी विरासत पर गर्व कर सकेंगे।

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