नई दिल्ली: आज यानी 26 फरवरी को भारत के महान क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी, समाजसुधारक, इतिहासकारवीर सावरकर की पुण्यतिथि मनाई जा रही है। इस अवसर परमहाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम ने वीर सावरकर गार्डन, थीम पार्क और नासिक में एक संग्रहालय विकसित करने का फैसला किया है। इस अवसर पर पर्यटन मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा आज नासिक में औपचारिक समारोह में शामिल होंगे।
महाराष्ट्र सरकार के एक आदेश में कहा गया है, 26 फरवरी को वीर सावरकर की पुण्यतिथि के अवसर पर, महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम ने वीर सावरकर गार्डन, थीम पार्क और संग्रहालय को अपने फंड से विकसित करने का प्रस्ताव दिया है।
साथ ही ये भी कहा गया है कि नगरपालिका परिषद को संबंधित ठेकेदार को वर्तमान में पूर्ण किए गए कार्य की राशि का भुगतान करना चाहिए और उक्त कार्य को महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम की स्थिति में वर्गीकृत करना चाहिए। उसके बाद, महामंडल द्वारा उक्त कार्य को पूरा किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, यदि अतिरिक्त कार्य किया जाना है, तो महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम को अपने फंड से एक अलग निविदा प्रक्रिया का संचालन करना चाहिए। उक्त थीम पार्क या संग्रहालय का स्वामित्व नगर परिषद के पास रहेगा, लेकिन निगम को इसका निर्माण करना चाहिए।
वीर सावरकर के निधन पर एक नजर
वीर सावरकर को लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं। लोग उनके जीवन और सजा के बारे में भी जानना चाहते हैं लेकिन लोगों के मन में सवाल है कि आखिर वीर सावरकर की मौत कैसे हुई थी? वीर सावरकर की निधन 26 फरवरी 1966 को हुआ था। जब उनका निधन हुआ, उस समय वह 82 साल के थे। आम तौर पर माना जाता है कि उन्होंने खुद अपने लिए इच्छामृत्यु चुनी थी। कहा जाता है किनासिक जिलेके कलेक्टर जैकसन की हत्या के लिए नासिक षडयंत्र काण्ड के अन्तर्गत इन्हें 7 अप्रैल, 1911कोहुई काला पानीकी सजा ने उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला था। जिसके बाद उन्होंने खुद के लिए इच्छामृत्यु का रास्ता चुना। दरअसल वह इसे स्व बलिदान बताते थे।
कैसे हुआ निधन?
ऐसा माना जाता है कि वीर सावरकर ने खुद अपने लिए इच्छा मृत्यु जैसी स्थिति चुनी थी। अपनी मृत्यु से करीब एक महीने पहले से उन्होंने उपवास करना शुरू कर दिया था। माना जाता है कि इसी उपवास के कारण उनका शरीर कमजोर होता गया और फिर 82 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया।
सावरकर के मुताबिक, आत्महत्या और आत्मसमर्पणका मतलब
सावरकर ने अपनी मृत्यु से दो साल पहले 1964 में आत्महत्या या आत्मसमर्पण नाम का एक लेख लिखा था। इस लेख में उन्होंने अपनी इच्छा मृत्यु के समर्थन को स्पष्ट किया था। इसके बारे में उनका कहना था कि आत्महत्या और आत्म-त्याग के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर होता है। इसके पीछे सावरकर का तर्क था कि एक निराश इंसान आत्महत्या से अपना जीवन समाप्त करता है लेकिन जब किसी के जीवन का मिशन पूरा हो चुका हो और शरीर इतना कमजोर हो चुका हो कि जीना असंभव हो तो जीवन का अंत करने को स्व बलिदान कहा जाना चाहिए।
ऐसा कहा जाता है कि वीर सावरकर ने अपने आखिरी अपने आखिरी दिनों में दवाई लेना भी बंद कर दिया था। सावरकर की आत्मकथा मेरा आजीवन कारावास के परिशिष्ट में उनके अंतिम दिनों में लिखे गए कई पत्र प्रकाशित हैं। इसमें कहा गया है कि जीवन में आए क्षणों के जरिए इच्छा मृत्यु की व्याख्या भी की है। इसी के कारण उन्होंने दवाई और खाना पीना तक बंद कर दिया था. इसलिए लोग कहते हैं कि उन्होंने इच्छा मृत्यु चुनी।
वीर सावरकर का व्यक्तित्व
विनायक दामोदर सावरकर भारतके महान क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी, समाजसुधारक, इतिहासकार, राष्ट्रवादी नेता तथा विचारक थे। उन्हें प्रायःस्वातन्त्र्यवीरऔरवीर सावरकरके नाम से सम्बोधित किया जाता है। हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीतिक विचारधारा (हिन्दुत्व) को विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय सावरकर को जाता है। वे एक वकील, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक और नाटककार भी थे। उन्होंने परिवर्तित हिन्दुओं के हिन्दू धर्म को वापस लौटाने हेतु सतत प्रयास किये एवं इसके लिए आन्दोलन चलाये। उन्होंने भारत की एक सामूहिक हिन्दू पहचान बनाने के लिए हिन्दुत्वका शब्द गढ़ा। उनके राजनीतिक दर्शन मेंउपयोगितावाद,तर्कवाद,प्रत्यक्षवाद(positivism),मानवतावाद,सार्वभौमिकता, व्याहारिकताऔरयथार्थवादके तत्व थे। सावरकर एक कट्टर तर्कबुद्धिवादी व्यक्ति थे जो सभी धर्मों के रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते थे।
विनायक सावरकर का जन्म महाराष्ट्र(उस समय, बॉम्बे प्रेसिडेन्सी) में नासिकके निकट भागुर गांवमें हुआ था। उनकी माताजी का नाम राधाबाई तथा पिताजी का नाम दामोदर पन्त सावरकर था। इनके दो भाई गणेश (बाबाराव) व नारायण मां दामोदर सावरकरतथा एक बहन नैनाबाई थीं। जब वे केवल नौ वर्ष के थे तभी हैजेकी महामारीमें उनकी माता जी का देहान्त हो गया। इसके सात वर्ष बाद सन् 1899में प्लेगकी महामारी में उनके पिता जी भी स्वर्ग सिधारे। इसके बाद विनायक के बड़े भाई गणेश ने परिवार के पालन-पोषण का कार्य सँभाला।
दुःख और कठिनाई की इस घड़ी में गणेश के व्यक्तित्व का विनायक पर गहरा प्रभाव पड़ा। विनायक ने शिवाजी हाईस्कूल नासिक से 1901में मैट्रिक की परीक्षा पास की। बचपन से ही वे पढ़ाकू तो थे ही अपितु उन दिनों उन्होंने कुछ कविताएँ भी लिखी थीं। आर्थिक संकट के बावजूद बाबाराव ने विनायक की उच्च शिक्षा की इच्छा का समर्थन किया। इस अवधि में विनायक ने स्थानीय नवयुवकों को संगठित करकेमित्र मेलोंका आयोजन किया। शीघ्र ही इन नवयुवकों में राष्ट्रीयता की भावना के साथ क्रान्ति की ज्वाला जाग उठी।सन् 1901में रामचन्द्र त्रयम्बक चिपलूणकर की पुत्री यमुनाबाई के साथ उनका विवाहहुआ। उनके ससुर जी ने उनकी विश्वविद्यालय की शिक्षा का भार उठाया। 1902में मैट्रिक की पढाई पूरी करके उन्होने पुणेके फर्ग्युसन कालेज से बी॰ए॰ किया।