बिहार में ‘चच्चा नीतीश’ के आगे ‘चौकीदार’ नतमस्तक

नई दिल्ली : 17 वीं लोकसभा का चुनावी बिगुल बीते दिनों चुनाव आयोग द्वारा फूंका जा चूका है। इस बार का लोकसभा चुनाव समस्त देश में 7 चरणों में संपन्न होगा। आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम के अनुसार बिहार में सभी सातों चरणों में चुनाव होगा।

बिहार में 40 लोकसभा सीटें हैं। संख्या की दृष्टि से दो सबसे बड़े समूहों – यादव और मुसलमान के इर्द-गिर्द ही बिहार राजनीति का ताना-बाना बुना है। बिहार का जातीय समीकरण, लोकतांत्रिक राजनीति की किताबी समझ को चुनौती देता है। यही जातीय समीकरण बिहार के चुनाव परिणाम तय करता है। बिहार में मुख्य तौर से सवर्ण जाति समूह, यादव – गैर यादव ओबीसी जाति समूह, अति पिछड़ी और महादलित जाति समूह और मुसलमान समुदाय रहते हैं।

यही कारण है कि प्रभु श्री राम का नाम जपने वाली भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा ) बिहार लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारे और सीटों के चयन में अपने दोनों सहयोगी दलों जनता दल यूनाइटेड ( जदयू ) और लोक जनशक्ति पार्टी ( लोजपा ) के आगे नतमस्तक हो गयी है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो तन कर चलने वाले चौकीदार की हेकड़ी बिहार में निकल गयी है।

भारतीय जनता पार्टी बिहार में 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड से के अलग होने के बाद रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ( लोजपा ) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ( रालोसपा ) के साथ गठबंधन कर चुनावी मैदान में उतरी थी। गठबंधन के तहत बीजेपी ने 30 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 22 सीटों पर उसे जीत मिली थी। वहीं एलजेपी 6 और आरएलएसपी 3 सीटें जीतने में कामयाब रही थी।

इस बार भाजपा के सहयोगियों में उपेंद्र कुशवाहा ने उनका साथ छोड़ दिया है। वह इस चुनाव में महागठबंधन के साथ हैं।

इस 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी बिहार की 40 लोकसभा सीटों के लिए 17 + 17 + 6 के फॉर्मूले के साथ मैदान में है। जो पिछले लोकसभा चुनाव से एकदम उलट है।

सीटों के बटवारें से लेकर, सीटों के चयन तक भारतीय जनता पार्टी, जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) से क़दम-क़दम पर समझौता करने को विवश दिख रही है। जिन सीटों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के ये तीनों घटक चुनाव लड़ेंगे, उनकी सूची से भी बीजेपी की मजबूरी झलक उठती है। यानी राज्य के मुख्यमंत्री और जेडीयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने सीटों के चयन में अपने दलीय हित के अनुकूल बीजेपी नेतृत्व को जैसे चाहा वैसे झुका लिया है।

बीजेपी के प्रभाव वाली ( भागलपुर-नवादा ) सीटों पर जदयू और लोजपा उम्मीदवारों का ऐलान करना बीजेपी की बिहार में कमज़ोर होती स्तिथि को साफ तौर से दर्शाता है।

ज़ाहिर है कि चुनावी राजनीति में ऐसा वही करता है, जिसे अपने कमज़ोर या घटते जनसमर्थन का अहसास हो जाय और वैसी सूरत में सहयोगी दल के आगे झुकना उसे ज़रूरी लगने लगे।

सवाल ये है कि राष्ट्रवाद, उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा के आतंकी हमले के बाद बालाकोट एयर-स्ट्राइक करने और जनाधार का दम भरने वाली बीजेपी बिहार में बैकफुट पर क्यों है ?

वैसे, जैसे-जैसे समय बीत रहा है, वैसे-वैसे इन दोनों घटनाओं और झूठे राष्ट्रवाद का जनमानस पर छाया हुआ गहरा असर धीरे-धीरे समाप्त होने लगा है।

स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि विकास, रोज़गार और सुरक्षा के मुद्दों पर पराजित एनडीए की वर्तमान सरकार बिहार में जातिगत समीकरण के बूते चुनाव जीतना चाहती है। यही कारण है कि वह अपने सहयोगियों के समक्ष पूरी तरह नतमस्तक है।

लोकसभा चुनाव परिणाम तय करेंगे कि बिहार की जनता इस लोकसभा चुनाव में जातीय समीकरण को दरकिनार करती है या इसी जातीय समीकरण से चुनाव परिणामों को प्रभावित करती है।

बताते चलें कि बिहार विधान सभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी ने लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था।

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