गुजरात से लौटकर संतोष कुमार सिंह
नरेंद्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बने 8 वर्ष से ज्यादा हो चुके हैं। लेकिन गुजरात से बाहर रह रहे लोगों के लिए आज भी गुजरात मॉडल एक पहेली बना हुआ है। जिसकी चर्चा समय.समय पर होते रहती है। विशेष रूप से उस वक्त जब आम चुनाव का वर्ष होता है या फिर गुजरात में चुनाव होता है। देश का शायद ही कोई ऐसा राज्य हो और वर्ष 2012 के बाद शायद ही कोई ऐसा चुनाव हो जहां गुजरात मॉडल चर्चा मे न रहा हो। इस साल के अंत में गुजरात में चुनाव है तो स्वाभाविक तौर पर गुजरात मॉडल की चर्चा होने लगी है।
कोरोना के बाद की परिस्थिती में जब गुजरात जाने का अवसर मिला विशेष तौर पर नर्मदा तट पर बसे उन ईलाकों में, उन गांवो में जो अमूमन पिछड़े माने जाते हैं या फिर आदिवासी ईलाके कहलाते हैं और व्यवसायिक शहर और अर्थव्यवस्था की प्रमुख गतिविधियों के केंद्र के रूप में पहचान गढ़ चुके अहमदाबाद, गांधी नगर, बरोदा, सूरत की चौहद्दी से काफी दूर हैं। हालाकी इसी इलाके में नर्मदा नदी के तट पर सरदार सरोवर बांध के निकट केवड़िया में भारत की एकीकरण के अग्रदूत सरदार बल्लभ भाई पटेल की स्टैच्यू ऑफ यूनिटी है, जिसे नजदीक से देखने और सरदार के विराट व्यक्तित्व को समझने का मौका भी मिला।
आदिवासी जिलों में सामाजिक योजनाओं की पड़ताल
बड़ी बात ये है कि गुजरात के 33 जिलों में से 14 आदिवासी जिले हैं और हम निकले थे इन्हीं आदिवासी इलाकों में उन योजनाओं की पड़ताल करने जो भले ही आर्थिक विकास की बुनियाद पर न टिके हों लेकिन सामाजिक विकास की बुनियाद इन्हीं योजनाओं की बदौलत तैयार होती है। और इन इलाकों में घूमने का हमारा मुख्य मकसद था उन योजनाओं को नजदीक से देखना समझना जिसकी बदौलत सही मायने में गुजरात के सामाजिक विकास को समझा जा सकता है और किसी भी समाज के विकास को समझने का मुख्य पैमाना होता है वहां के मातृ शिशु कल्याण और किशोर, किशोरियों के बेहतरी से जुड़ी योजनाओं को समझना। उनके स्वास्थ्य की पड़ताल करना ओर पोषण की स्थिती को समझना। ये वो योजनायें थी जिनका दायरा नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद पूरे देश तक विस्तृत हो गया है लेकिन आज भी उसका मानक गुजरात ही बना हुआ है। और आज भी ये गुजरात मॉडल का आधार बनी हुई हैं जिसे गुजरात सरकारए यूनिसेफए पंचायती राज संस्थाएं और आंगनवाड़ी केंद्र दूर दराज के आदीवासी गांवों में संचालित कर रहे हैं।
पोषण सुधा योजना यानी पूर्णा योजना
गुजरात सरकार के महिला व बाल विकास विभाग द्वारा माताओं के पोषण, बच्चे की बेहतरी पर इसका प्रभाव और बाल पोषण के मद्देनजर यूनिसेफ के तकनीकी सहयोग से वर्ष 2017 के जुलाई माह में 5 आदिवासी बहुल जिलों के मसलन नर्मदा,छोटाउदेपुर, वलसाड, महिसागर और दाहोद जिले के 6 विकासशील तालुकों के 10 आईसीडीएस ब्लॉक में पायलट आधार पर पोषण सुधा योजना शुरू की। इस योजना का मुख्य उद्देश्य आंगनबाडी केंद्र में प्रतिदिन सोमवार से शनिवार, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं की जांच परख के साथ आईएफए पूरकता और पोषण परामर्श के साथ एक पूर्ण भोजन के प्रावधान करना है। जिसके तहत सारी महिलायें व बच्चे एक ही स्थान पर एकत्रित होते हैं उनके आवश्यक पोषण और स्वास्थ्य सेवा की बेहतर व्यवस्था किये जाने का प्रावधान है। इतना ही नहीं इस कार्यक्रम से संबंधित डेटा को महिला एवं बाल विकास विभाग प्रोग्राम डेटा डीडब्ल्यूसीडी द्वारा विकसित ऐप में कैप्चर किया जाता है।
वित्तीय वर्ष 2022.-23 में इस पायलट योजना को और ज्यादा विस्तार देने का निर्णय महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा राज्य की बजट के हिसाब के माध्यम से लिया गया। जिस योजना के तहत
5 आदिवासी जिलों के 10 आईसीडीएस ब्लॉकों को कवर किया जाना था। लेकिन अब इस योजना को 14 जनजातीय जिलों से 106 आईसीडीएस ब्लॉक तक विस्तारित कर लगभग 160.000 गर्भवती को कवर किये जाने की दिशा में काम किया गया है। राज्य स्तर पर योजना के विस्तार में यूनिसेफ ने महिला एवं बाल विकास विभाग का सहयोग किया है।
आपके जेहन में ये सवाल उठ सकता है कि कि आदिवासी इलाकों में स्थानीय स्तर पर सबकुछ उपलब्ध होता तो भला अतिरिक्त पोषण की जरूरत ही क्यों होती है। आदिवासी इलाकों में पोषण की समस्या उतनी ही है जितनी अन्य क्षेत्रों में है। बावजूद इसके वहां वे सभी प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं जो पोषण के लिए जरूरी हैं। इनका सही समय पर सही इस्तेमाल उन बच्चों को पोषण दिलाने में बहुत मददगार साबित हो रहा है। यहीं सरकार और यूनिसेफ जैसी संस्थाओं की भूमिका शुरू होती है और वे अपनी भूमिका बखूबी निभा भी रही हैं जो गुजरात मॉडल का आधार है। मसलन बच्चों और महिलाओं के लिए काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ ने इस दिशा में लगभग सभी राज्यों में पहल की है और उसके अच्छे परिणाम नज़र आ रहे हैं। सही जानकारी और बेहतर प्रबंधन से ही कई तरह की समस्यायें सुलझ जाती हैं। उदाहरण के लिए हम हम पूर्णा योजना को देख सकते हैं। इस योजना की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसके जरिए न सिर्फ पूर्ण आहार मिलता है बल्कि हर स्तर पर चाहे सरकार के स्तर परए सामदायिक संस्थाओं के स्तर पर हो या फिर यूनिसेफ जैसी संस्थाओं के स्तर हरेक स्तर पर यह कार्यक्रम पूर्णता का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
घर में है पोषण तो काहे का कुपोषण
कहा भी गया है कि घर में है पोषण तो काहे का कुपोषण। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है पूर्णा योजना। बच्चों को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पोषक खुराक दे रही हैं और उनकी मांओं को इस बारे में शिक्षित कर रही हैं क्योंकि पोषण के सभी तत्व वहां के खेतों में ही मौजूद हैं। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता इसके लिए वहां उग रही सागण्सब्जी का सहारा ले रही हैं। आदिवासी इलाकों की हर आंगनवाड़ी के किचन गार्डन में ऐसी सब्जियां उगाई जा रही हैं जिनमें पोषण बहुत है मसलन पत्ता गोभी, अरबी, भिंडी, करेले और जमीन में उगने वाले कुछ कंद। इनके अलावा स्थानीय स्तर पर उगने वाली दालों के उपयोग पर काफी ज़ोर दिया जाता है। आदिवासी इलाकों में कई तरह की दालें उगती हैं। आंगनवाड़ी की कार्यकर्ता महिलाओं को उन्हें सही ढंग से बनाने की शिक्षा खुद बनाकर देती हैं। साथ ही वे दाल में तरहण्तरह की सब्जियों के पत्ते डालकर तैयार करने को कहती हैं। इनमें सहजन के पत्ते सबसे महत्वपूर्ण हैं जिन्हें अंग्रेजी में मोरिंगा कहते हैं। उसे अब दुनिया भर में सुपरफूड माना जाता है लेकिन आदिवासी इलाकों में यह सदियों से इस्तेमाल हो रहा था।
दूसरी योजना है दूध संजीवनी योजना
महिला एवं बाल विकास विभागगुजरात सरकार ने दूध संजीवनी योजना 128 ब्लॉक में शुरू की जिसमें 110 आदिवासी, 28 विकासशील ब्लॉक है। योजना के तहत आंगनबाडी केंद्र में नामांकित बच्चों और महिलाओं को फ्लेवर्ड, फोर्टिफाइड, विटामिन ए और डी, डबल टोंड पाश्चुरीकृत दूध प्रदान किया जाता है। इस योजना के तहत 6 महीने से 6 साल की उम्र के बच्चों को सप्ताह में पांच दिन, सोमवार से शनिवार 100 मिलीलीटर फ्लेवर्ड फोर्टिफाइड दूध और प्रत्येक गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को सप्ताह में दो बार 200 मिलीलीटर प्रदान किया जाता है।
आंगनवाड़ी केन्द्रों को यहां नंदगढ़ कहते हैं। इन केन्द्रों दूध संजीवनी कार्यक्रम का संचालन हो रहा है यानी आप कह सकते हैं नंद के आंगन में कान्हा भी मस्त हैं और कान्हा तभी मस्त रहेंगे खिलखिलायेंगे जब यशोदा को भी पौष्टिक आहार मिलेगा।
प्रारंभिक बाल विकास परियोजनाए जिसे नीति आयोग ने किया अनुमोदित
गरुड़ेश्वर के चयनित एक ब्लॉक के लिए आईसीडीएस और यूनिसेफ द्वारा संयुक्त रूप से एक शुरूआती शिशू देखभाल से संबंधित एक योजना का संचालन किया जा रहा है जिसके अंतर्गत पहले हजार दिनों यानी गर्भाधान से लेकर दो साल की उम्र तक की अवधि को ध्यान केंद्रित कर एक योजना तैयार की गई थी। जिसे नीति आयोग को प्रस्तुत किया गया और आयोग द्वारा इसे अनुमोदित भी किया गया है। इस के अंतर्गत 1 वर्ष के लिए 92 ईसीडी परामर्शदाताओं की भर्ती की गई है। यूनिसेफ तकनीकी रूप से परियोजना का समर्थन कर रहा है और पहले 1000 दिनों पर ध्यान केंद्रित करते हुए ईसीडी के तहत कवर किए गए विभिन्न घटकों से जुड़े विभिन्न विंदुओं पर इन कांउसलरों को प्रशिक्षित किया है। ईसीडी काउंसलर की भूमिका आंगनवाड़ी केंद्रों, वीएचएसएनडी के माध्यम से आईसीडीएस और स्वास्थ्य के तहत प्रदान की जाने वाली सेवाओं का लाभ उठाने के लिए विभिन्न लाभार्थियों को जुटाना है। इसके साथ ही वे उम्र के अनुकूल भोजन दिए जाने और उम्र के अनुकूल खेल गतिविधियों को शामिल करने के साथ-साथ आयु के अनुरूप किस तरह की देखभाल की जानी चाहिए इसके संबंध में भी परामर्श देने संबंधी कार्य भी करते हैं। बच्चों के साथ ही उनके माता.पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को बच्चों के पालन पोषण सं संबंधित गतिविधियों में शामिल कर बच्चों के बेहतर विकास सुनिश्चित करने संबंधी परामर्शकारी भूमिका निभाते हैं और उनकी बेहतर देखभाल सुनिश्चित करते हैं। वे एफएलएफ के साथ माता-पिता के लिए बनाये गये समूह की बैठकों, घर के दौरे आदि में भाग लेते हैं ताकि माता-पिता को बच्चों के प्रारंभिक विकास संबंध गतिविधियों और उसके अनुकूल व्यवहार अपनाने में मदद करें ताकी उनका समुचित विकास हो सके।
बड़ी बात यह है कि बच्चों के लालन पालन सिर्फ उस माता.पिता की जवाबदेही न हो बल्कि पूरा समाज मिलके उसकी जवाबदेही उठाए इस तरह के नूतन प्रयोग भी यहां की आंगनवाड़ियां करती है जिसमें यूनिसेफ का पूरा सहयोग है। मसलन आप पाएंगे कि आंगनवाड़ियों में एक और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलता है और वह है सासू मां के लिए जिनकी परिवार चलाने में भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उन्हें बहू के खानपान के बारे में वैज्ञानिक तरीके से समझाया जाता है ताकि वे पूर्वाग्रहों से निकलें और समय के अनुरूप वे बहू के साथ मिलकर बच्चों के लालन पालन में अपना योगदान दें।
जाहिर है ये योजना सिर्फ गुजरात में चल रहे महिला एवं बाल स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों की बानगी भर है जिसके जरिए गुजरात के इन ग्रामीण आदिवासी इलाकों में नौनिहालों का जीवन तो बदल ही रहा है साथ ही जन्मदात्री मां भी बच्चों के साथ खुद का भी ख्याल रख पा रही हैं। इसके अलावां भी अन्य योजनायें भी रही होंगी जिसके जरिए गुजरात मॉडल की चर्चा गुजरात की सीमा को लांघते हुए पूरे देश में हो रही है और इस मॉडल के शिल्पकार की भूमिका निभा चुके नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री के रूप में देश में काम कर रहे हैं तो इसका प्रभाव और स्वरूप देश व्यापी हो इसकी उम्मीद को गुजरात मॉडल की चर्चा के जरिए जरूर बल मिलता है।