25 जून: लोकतंत्र का काला दिन, संविधान की चेतावनी देशभर में संविधान हत्या दिवस मनाया गया

June 25 Dark Day Democracy: (नई दिल्ली): आज 25 जून है। वह तारीख, जिसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। साल 1975 में इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा की थी। इस घोषणा के बाद पूरे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को लगभग स्थगित कर दिया गया था।

आपातकाल एक दिन, जिसने देश की आवाज़ छीन ली

25 जून 1975 को घोषित आपातकाल 21 महीनों तक चला। इस दौरान संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। प्रेस की आज़ादी खत्म कर दी गई, हजारों राजनीतिक विरोधियों को बिना मुकदमा चलाए जेल में डाला गया, और जनता की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाबंदी लगा दी गई। यह वह दौर था जब डर, चुप्पी और सेंसरशिप ने लोकतंत्र की जगह ले ली थी।

सरकार ने कहा यह दिन एक चेतावनी है

केंद्र सरकार ने इस दिन को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाते हुए कहा कि 25 जून न केवल इतिहास की एक तारीख है, बल्कि वह दिन है जो हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र कितनी नाज़ुक चीज़ है और उसकी रक्षा के लिए सतर्क रहना कितना ज़रूरी है। सरकार की तरफ़ से कहा गया कि यह दिन हर भारतीय को अपने संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में सोचने और उन्हें बचाए रखने का संकल्प लेने का दिन है।

दिल्ली की सड़कों पर दिखा पोस्टरों का संदेश

राजधानी दिल्ली सहित कई शहरों में ‘संविधान हत्या दिवस’ के पोस्टर और चित्र लगे दिखाई दिए। इन पोस्टर्स में आपातकाल के समय की तस्वीरें थीं जैसे बंद अखबारों के फ्रंट पेज, जेल में बंद नेताओं की तस्वीरें और संविधान की प्रस्तावना के साथ “संविधान बचाओ” जैसे संदेश। कई संगठनों ने सार्वजनिक स्थानों पर जनसभाएं और जागरूकता रैलियां आयोजित कीं।

राजनीति भी गर्माई कांग्रेस का पलटवार

हालांकि, इस दिन को लेकर राजनीति भी गर्म रही। विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस, ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए इसे ‘राजनीतिक नौटंकी’ बताया। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा, “जो लोग खुद आज संविधान को कमजोर कर रहे हैं, वे ही आज संविधान की दुहाई दे रहे हैं। लोकतंत्र की रक्षा सिर्फ भाषणों से नहीं, आचरण से होती है।”

क्या आपातकाल की यादें आज भी ज़िंदा हैं?

25 जून सिर्फ एक तारीख नहीं, एक सबक है। यह दिन हमें बताता है कि संविधान सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक की आवाज़, अधिकार और आत्मसम्मान का प्रतीक है। इतिहास की यह चेतावनी आज भी प्रासंगिक है कि लोकतंत्र को शब्दों से नहीं, सतर्कता और जिम्मेदारी से जिंदा रखा जाता है।

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